हिमाचल प्रदेश के सुदूर अंचल में, जहाँ देवदार और चीड़ के घने जंगल आसमान को छूने की होड़ करते हैं, वहीं बसा है एक छोटा सा, शांत गाँव—'शैलकुंज'। इस गाँव की सुबह दुनिया के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग होती थी। जब सूरज की पहली किरणें बर्फ से ढकी चोटियों को छूकर नीचे उतरतीं, तो पूरा गाँव एक सुनहरी और धुंधली चादर में लिपट जाता था। ठंडी हवा के झोंके जब लकड़ी के घरों की खिड़कियों से टकराते, तो एक अजीब सी सरसराहट पैदा होती थी। इसी गाँव के सबसे ऊपरी छोर पर, चट्टानों के बीच बना एक दो मंजिला पुराना घर था। यह घर पत्थरों और स्लेट की छतों से बना था, जिसके आंगन में हमेशा पहाड़ी फूलों की महक बिखरी रहती थी। इसी घर में रहती थी सिमी। सिमी हाल ही में 18 साल की हुई थी, लेकिन उम्र का यह आंकड़ा उसके लिए केवल एक संख्या मात्र था। जहाँ इस उम्र में आकर गाँव की दूसरी लड़कियाँ लज्जा, संकोच और लोक-लाज के बंधनों में बंध जाती हैं, दुपट्टे से अपना बदन छुपाने लगती हैं और पुरुषों की निगाहों से बचने के लिए नजरें झुकाकर चलती हैं, वहीं सिमी इन सब सांसारिक नियमों से कोसों दूर थी। उसके भीतर का बचपना समय के साथ कम होने के बजाय और ज्यादा गहरा हो गया था। उसकी हरकतें, उसकी सोच और उसका अंदाज़ अब भी एक आठ-नौ साल के अबोध बच्चे जैसा था, जिसे इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि दुनिया उसे किस नजर से देखती है। सिमी को कपड़े पहनना एक सजा जैसा लगता था। भारी-भरकम सलवार-कमीज, लहंगे या ऊनी कुर्तियों में उसे ऐसा लगता मानो उसकी आजादी किसी ने छीन ली हो। इसलिए, वह अपने घर में और उसके आसपास के निजी बगीचे में हमेशा केवल अंतःवस्त्रों में ही घूमती रहती थी। उसकी अलमारी में तरह-तरह के कपड़े थे, जिन्हें उसकी माँ ने बड़े चाव से सिलवाया था, लेकिन सिमी को सबसे ज्यादा पसंद थी अपनी काली ब्रा और उससे मैचिंग पैंटी। वह इसी रूप में पूरे घर में, आंगन में और कभी-कभी तो बेझिझक गाँव की सूनसान पगडंडियों पर भी निकल जाती थी। उसकी माँ, पार्वती, अक्सर उसे टोकती: "सिमी! अरे ओ सिमी! कम से कम शरीर पर एक कुर्ता तो डाल ले बेटी। अब तू बच्ची नहीं रही, अठारह साल की जवान लड़की है। लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?" लेकिन सिमी अपनी माँ की बात को एक कान से सुनती और दूसरे से उड़ा देती। वह अपनी माँ के गले में बाहें डाल देती और चुलबुले अंदाज में कहती: "ओहो माँ! तुम भी न हमेशा कपड़ों के पीछे पड़ी रहती हो। इन कपड़ों में मुझे बहुत गर्मी लगती है और घुटन भी होती है। और वैसे भी, मुझे कौन देख रहा है यहाँ? ये पेड़, ये पहाड़? ये तो मेरे दोस्त हैं!" पार्वती अपनी बेटी की इस मासूमियत और जिद के आगे हार मान लेती। वह जानती थी कि सिमी का दिल पूरी तरह साफ है, उसके मन में कोई खोट या वासना नहीं है, वह तो बस प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी एक आजाद पंछी है। लेकिन पार्वती का डर भी गलत नहीं था, क्योंकि सिमी का बदन अब एक ऐसी कयामत का रूप ले चुका था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का संभलना नामुमकिन था।
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Chapter 1
शैलकुंज की सुबह और एक अनोखी सुंदरी - Chapter 1 -
Chapter 2
पहाड़ों से माया नगरी का सफर -
Chapter 3
पानी में छपाक और पूरी तरह आज़ाद बदन -
Chapter 4
शाम का धुंधलका और घर जाने की याद -
Chapter 5
रईसजादों का धावा और सिमी का खुला दान -
Chapter 6
कल रात की रसीली यादें और लड़कों की वाहवाही -
Chapter 7
10 दिनों का कॉलेज टूर और कार का सफर और हवस -
Chapter 8
कार में गूंजती सिसकियां -
Chapter 9
वादियों में हुस्न का सैलाब -
Chapter 10
थके हुए जिस्म की अलमस्त राहत -
Chapter 11
अमित का कड़क प्रहार और रात भर का रोमांच -
Chapter 12
सफर का अंतिम छोर और सामूहिक समर्पण