My Dream Love - Chapter 2
परिस्थान में कुछ देर बाद, सारी परियाँ वहाँ से चली गईं, लेकिन परीशा वहाँ से उठकर नहीं गई। वह अभी भी वहाँ बैठकर रोती हुई, रानी परी का इंतज़ार कर रही थी। लेकिन उसके दिमाग में बाकी सारी परियों की बात अभी भी चल रही थी, क्योंकि वे सारी परियाँ सही कह रही थीं। रानी माँ इस तरह से जब भी अपने ध्यान में बैठी हैं, कभी भी 10 दिन से पहले वापस नहीं आती हैं। इसलिए उनका इंतज़ार करना बेकार था।
परीशा पहले ही ७ दिन से वहाँ बैठकर उनका इंतज़ार कर रही थी। लेकिन अभी तक वह नहीं आई थी। तो उसने कुछ सोचा। वह वहाँ से उठकर खड़ी हुई और अपने सामने रखी सारी परियों की मणियों को एक नज़र देखा।
जिनमें से वह हल्के आसमानी रंग की मणि, जो एकदम काली पड़ चुकी थी, उसकी रोशनी भी लगभग खत्म हो गई थी। उस मणि की तरफ देखते हुए परीशा की आँखों में आँसू आ गए और जैसे ही वे आँसू जमीन पर गिरे, एक पीला फूल बन गए।
उस मणि की तरफ देखते हुए वह अपने मन में बहुत कुछ सोच रही थी। तभी उसने अपने आँसू पोछे और मन में कुछ सोचती हुई वहाँ से आगे बढ़ी।
उसने अपनी जादू की छड़ी उठाई, जो कि सुनहरे रंग की थी और उस पर बीच में एक सुनहरा सितारा बना हुआ था।
फिर आँखें बंद करके धीमी आवाज़ में परियों का कुछ मंत्र बुदबुदाने लगी, और वह एकदम धीमी आवाज़ में वह मंत्र पढ़ रही थी।
तभी एकदम से एक और सफ़ेद रोशनी उसके सामने आई, जो कि धुएँ के रूप में थी।
परीशा को उसके होने का अहसास हुआ। तो अपना मंत्र पढ़ना रोककर उसने आँखें खोलकर सामने की तरफ देखा। तो उसे वह सफ़ेद बादल अपने एकदम सामने नज़र आए।
जो कि अब धीरे-धीरे एक आकार ले रहा था। और परीशा शायद समझ गई कि वह कौन है, इसलिए उसने बोला,
"रानी माँ आप यहाँ?"
उसके सामने एक परी खड़ी थी, जिसके पूरे कपड़े एकदम चमकदार सफ़ेद रंग के थे और उसके पूरे शरीर से उसी तरह की सफ़ेद रोशनी निकल रही थी। उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी और आँखों में एकदम सौम्यता और शालीनता नज़र आ रही थी। अपने सामने परीशा को देखकर उन्होंने एकदम नरमी से कहा,
"क्या करने जा रही थी तुम परीशा? अपनी बहन की गलती दोहराओगी? वह भी जानबूझकर?"
उन्होंने यह बात बहुत ही आराम से कही। वह परीशा को डाँट नहीं रही थीं, बस उससे सवाल कर रही थीं और जवाब के इंतज़ार में उनकी नज़र परीशा पर ही टिकी हुई थीं।
वहीं परीशा की आँखों में फिर से आँसू भर आए और वह बहुत ही ज़्यादा परेशान होते हुए बोली,
"तो फिर क्या करूँ? मैं रानी माँ, आप ही बताइए। और कोई रास्ता भी तो नहीं है। मुझे अपनी बहन को ढूँढने के लिए जाना ही होगा, फिर चाहे कोई इसमें मेरा साथ दे या ना दे।"
रानी परी ने गम्भीरता से कहा,
"परीशा, क्या तुम्हें सच में ऐसा लगता है? मैं तुम्हारा साथ नहीं दूँगी और तुम इस तरह से बिना किसी को बताए अकेले ही धरती पर चली जाओगी। वह भी अपनी बहन को ढूँढने, जबकि तुम खुद ही अपनी बहन से हमेशा कहती थी कि धरती पर सारे बुरे लोग रहते हैं और किसी भी परी को गलती से भी वहाँ नहीं जाना चाहिए।"
रानी परी ने परीशा की तरफ देखते हुए कहा। तो उनकी ऐसी बातें सुनकर परीशा को वह सब कुछ याद आया और शर्मिंदगी से उसने अपना सिर नीचे झुका लिया। लेकिन साथ ही वह काफी परेशान भी थी। उसने उसी तरह से परेशान होते हुए कहा,
"लेकिन रानी माँ, मैं क्या करूँ? मुझे अपनी बहन को ढूँढना है और बाकी सब कहते हैं कि मेरी बहन मर गई है, लेकिन ऐसा नहीं है। मुझे पता है, वह नहीं मरी है और वह ज़िंदा है। मुझे उसे ढूँढना है।"
परीशा परेशान होते हुए यह सारी बातें बोल रही थी। तभी रानी परी ने उसके कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा और हल्की सी मुस्कराहट रानी परी के चेहरे पर आकर चली गई और फिर एकदम ही कहा,
"हाँ, मुझे पता है तुम्हारे लिए यह स्वीकार करना कठिन है। हम कभी भी किसी अपने प्रिय की मृत्यु को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते, और वह भी जब एक परी हो। लेकिन अगर वह सच में मर चुकी होगी और पृथ्वी पर जाने के बाद तुम भी किसी मुसीबत में पड़ गई, तो मैं अपनी सबसे शक्तिशाली और खूबसूरत परी को खोना नहीं चाहती।"
रानी माँ की बातें सुनकर परीशा ने नज़र उठाकर उनकी तरफ देखा और कहा,
"नहीं, मेरी बहन को कुछ नहीं हुआ है! वह ज़रूर कहीं फँस गई होगी। मुझे बस उसे ढूँढ कर पता करना है क्योंकि हम दोनों बहनों का बहुत ही मज़बूत बंधन है। अगर उसे कुछ भी होता तो मुझे पता चल जाता। लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि वह ज़िंदा है। आप प्लीज़ एक बार मुझे धरती पर जाने की अनुमति दीजिए। मैं कुछ ही दिनों में उसे ढूँढ लूँगी।"
रानी माँ ने परीशा की बहुत ही उम्मीद भरी नज़रों की तरफ देखते हुए पूछा,
"अगर मैं जाने की अनुमति ना दूँ तो क्या तुम हमारे नियम तोड़कर उसी तरह से अकेले धरती पर चली जाओगी जैसे तुम्हारी बहन गई थी?"
परीशा ने कहा,
"मैंने कभी भी कोई नियम तोड़ना नहीं चाहा और मैं आपको निराश भी नहीं करना चाहती। लेकिन मुझे मेरी बहन बहुत प्यारी है और अपने दिल की तसल्ली के लिए आप मुझे एक बार धरती पर जाने की अनुमति दे दीजिए। मुझे पता है उसे कुछ नहीं हुआ होगा। आपको भी पता है हम परियाँ इतनी आसानी से नहीं मर सकती हैं। उसको ज़रूर किसी ने धोखे से धरती पर बुलाया होगा। क्योंकि वह खुद से वहाँ पर क्यों जाएगी? ऐसी कोई भी वजह नहीं थी और हाँ, वह कभी-कभी बात करती थी। धरती पर उसे हर जगह जाने का शौक था और नई-नई जगहों और अलग दुनिया देखने का। लेकिन इसके अलावा कोई भी ऐसी ख़ास वजह नहीं थी।"
परीशा ने अपनी बहन की तरफ़ से सफ़ाई देते हुए ये सब कहा। सामने खड़ी रानी परी बहुत ही गौर से परीशा की पूरी बातें सुन रही थी और वह सारी बात सुनकर उन्होंने कहा,
"इसका मतलब है कि तुम हमारे ख़िलाफ़ जाकर भी अपनी बहन को ढूँढने के लिए जाओगी?"
रानी परी की बात सुनकर परीशा ने आँसू भरी आँखों के साथ उनकी तरफ़ देखा और कहा,
"रानी माँ, आप भी अगर मुझे नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा? आप मेरा साथ दीजिए। और मैं आपके ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहती हूँ। क्योंकि मुझे पता है, अगर आप मेरे साथ रहेंगी तो मेरे लिए धरती पर भी सारी चीज़ें आसान हो जाएँगी और आप इसमें मेरी मदद भी करेंगी?"
रानी परी ने कुछ सोचते हुए कहा,
"अच्छा, ठीक है। बताओ कितना समय चाहिए तुम्हें? और कितने समय में तुम वापस आ जाओगी?"
रानी परी ने जैसे ही यह बात कही, तो उनकी यह बात सुनकर परीशा की आँखें चमक गईं और वह खुश होकर उनकी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में अभी भी आँसू भरे हुए हैं, लेकिन चेहरे का डर और परेशानी अब उसकी खुशी में बदल गई है, क्योंकि रानी माँ साथ देने के लिए तैयार हो गई थीं।
परीशा ने खुश होते हुए कहा,
"बहुत-बहुत शुक्रिया रानी माँ, आपने मुझे समझा और मुझे यह मौका दिया। मैं आपको निराश नहीं करूँगी और सारे नियम के अंदर रहते हुए ही मैं वहाँ पर जाकर अपनी बहन को ढूँढ लूँगी। प्लीज़! बस आप मुझे वहाँ भेज देंगी ना? और वहाँ पर रहकर मैं आपसे बातें कर सकती हूँ।"
परीशा के इतने सारे सवाल सुनकर रानी माँ ने कुछ नहीं बोला। वह सिर्फ़ उसकी तरफ़ देखते हुए उसी तरफ़ हल्के से मुस्कुराती रहीं और फिर उन्होंने हवा में अपना हाथ घुमाया और उनके हाथों में एक चमकती हुई चीज़ आ गई, जिसे उन्होंने अपनी मुट्ठी में बंद कर दिया और फिर आँखें बंद करके कोई मंत्र पढ़ते हुए उस चीज़ को अपनी मुट्ठी में कुछ देर रखा और फिर अपनी मुट्ठी परीशा के सामने करके खोलते हुए कहा,
"यह अंगूठी। मैंने इसमें तुम्हारी और मेरी शक्तियों को आपस में जोड़ दिया है। अब तू इसे अपनी उंगली में पहन लो और जब भी तुम्हें मुझसे कोई मदद की ज़रूरत होगी, तुम इस अंगूठी को देखकर बस मुझे याद करना। मदद मिल जाएगी।"
रानी माँ की यह बात सुनकर परीशा बहुत ही खुश हुई और उसने तुरंत ही उनके हाथ से अंगूठी उठाकर अपने दाहिने हाथ की बीच की उंगली में पहन ली।
"तो मैं कब धरती पर जा रही हूँ?"
परीशा ने जैसे ही यह सवाल किया, रानी माँ ने ऊपर से नीचे तक उसकी तरफ़ देखा और तभी एक छोटा सा पक्षी उड़ता हुआ वहाँ पर आया और वह रानी माँ और परीशा के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा। और उस पक्षी की आवाज़ बहुत ही सुरीली थी। वह देखने में बुलबुल और तोते का मिला-जुला पक्षी लग रहा था क्योंकि उसका शरीर नीले रंग का था और उस पर सफ़ेद रंग के पंख थे और उसके सिर के ऊपर ताज जैसा था। छोटी सी पीली चोंच और काली आँखें। अपने छोटे पंख फड़फड़ाता हुआ वह पक्षी परीशा के चारों तरफ़ ही उड़ रहा था और फिर अचानक से आकर उसके कंधे पर बैठ गया। तो परीशा ने एक नज़र हैरानी से उसकी तरफ़ देखा।
वो पक्षी परीशा के चारों तरफ़ ही उड़ रहा था और फिर अचानक से आकर उसके कंधे पर बैठ गया।
तो परीशा ने एक नज़र हैरानी से उसकी तरफ़ देखते हुए कहा,
"कुटुम, तुम भी मेरे साथ आओगे?"
परीशा ने अपने कंधे पर बैठे हुए उस पक्षी के बच्चे की तरफ़ देखकर यह बात पूछी। तो वह पक्षी एकदम इंसानों की तरह बात करते हुए बोला,
"हाँ! मैं भी अपनी परी के साथ ही रहूँगा। जहाँ भी मेरी परी जाएगी, मैं उसके साथ जाऊँगा क्योंकि मैं तुम्हारा पक्षी हूँ।"
कुटुम की बात सुनकर परीशा हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन फिर उसने अपने सामने खड़ी रानी माँ की तरफ़ देखा। तो उन्होंने हल्के से अपनी पलकें झपकाईं, जिसका यह मतलब था कि वह अपने पक्षी को भी अपने साथ ही धरती पर ले जा सकती है, लेकिन उसके असली रूप में नहीं।
इसलिए रानी माँ ने उसे एक बेजान पक्षी में बदलकर परीशा के हाथ में दे दिया।
वह एकदम किसी प्लास्टिक की चिड़िया की तरह लगने लगा और अब वह बोल भी नहीं पा रहा था। यह देखकर परीशा उदास हो गई, तो रानी परी ने उसे पूरी बात समझा दी कि वह वहाँ धरती में सबके सामने इस पक्षी को अपने साथ इसी तरह से रख सकती है और वह धरती में सब के पास बोलने वाले पक्षी नहीं होते इसलिए और फिर अकेले में वह उसे वापस अपने जादू से पक्षी बना सकती है।
यह बात परीशा को समझ में आ गई, तो फिर वह ज़्यादा उदास नहीं हुई और उसने उस पक्षी को भी अपने साथ ही रख लिया। फिर रानी परी ने उसकी तरफ़ देखा।
परीशा ने फिर से पूछा,
"रानी माँ, मैं धरती पर कब जा सकती हूँ? इसके लिए कोई सही समय या किसी तरह की कोई प्रक्रिया होती है क्या?"
तो रानी परी ने उसकी तरफ़ देखकर कहा,
"नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं है और मुझे लगता है, अगर मैं यहाँ पर ना आती तो शायद तुम अकेले ही बिना किसी तैयारी के वहाँ पर चली जाती।"
रानी परी की यह बात सुनकर परीशा को काफी शर्मिंदगी हुई। क्योंकि सच में वह इस इरादे से ही वहाँ पर आई थी और उसने अपना सारा सामान भी लगभग ले लिया था। उसने पूरी शक्तियों के साथ ही वह धरती पर जाने के लिए एकदम तैयार थी, जबकि उसे धरती के बारे में कुछ भी नहीं पता था। अब रानी परी ने उसे बहुत कुछ बताया और इतना बोलते हुए रानी परी ने ऊपर से नीचे तक देखा और कहा,
"अभी तक तो एकदम तैयार लग रही थी, तो फिर अभी क्यों नहीं चली जाती?"
इतना बोलते हुए रानी परी के हाथ में एक छड़ी आ गई और उन्होंने अपनी छड़ी को एक बार घुमाया, तो परीशा वहाँ से एकदम से ही गायब हो गई।
रानी परी ने फिर से छड़ी घुमाई और वह भी वापिस सफ़ेद धुएँ में वहाँ से गायब हो गई।
क्रमशः
Buddies 💚🌹 कमेंट कर दीजिये अगर स्टोरी अच्छी लगे तो