नाजायज - Chapter 2
वैसे धर्म सिंह एक बड़े ही नेक सज्जन दिल इंसान थे पूरे गांव में उसके डर की वजह से किसी भी बहूं बेटी के साथ कोई छेड़खानी करने की हिम्मत तक नहीं कर सकता था,,,,,,,
एक समय था जब नंदिता का इतने बड़े घराने की बहू होने पर पूरे गांव में और समाज में उसका काफी सम्मान था,,,,,,,
पूरे गांव के लोग अपनी आंखों की नजरें ऊंची करके उससे बात तक नहीं कर सकते थे ना किसी की इतनी हिम्मत तक नहीं थी कि अपने मुंह से उसके बारे में कुछ गलत बोल सके,,,,,,
लेकिन आज कोई भी नंदिता की इज्जत नहीं करता उसे सम्मान देना तो दूर सम्मान से उसके बारे में बात तक नहीं करता,,,,,,
वैसे किस्मत का खेल भी अजीब है कभी किसी इंसान को पलकों पर बिठा देती है तो कभी किसी इंसान को पैरों की धूल से भी बदतर बना देती है,,,,,,
यही नसीब था नंदिता और उसकी बेटी कनिका का,,,,,,
क्या सच्चाई है और क्या नहीं यह कोई नहीं जानता था,,,,,,,
पूरे गांव में आखिर बरसों पहले ऐसा क्या हुआ कि नंदिता को इस तरह रहने पर अपनी बेटी के साथ मजबूर होना पड़ा,,,,,,
क्यों लोग उसे ऐसी नजरों से देखते हैं शायद इसके पीछे की हकीकत या सच्चाई क्या है कोई कभी जान पाए,,,,,,,
वही नंदिता अपनी ही आंखों के सामने अपनी बड़ी बेटी श्वेता और अपने पूरे परिवार को देखकर उन से दूर रहकर नंदिता को काफी तकलीफ होती,,,,,,
वहीं कनिका अपने स्कूल में अपने से एक क्लास आगे पढ़ने वाली अपनी बड़ी बहन श्वेता को देखती है,,,,,,
तब उसका दिल करता है कि बह अपनी बहन से बातें करें उसके गले लगे उसके पास बैठे हैं लेकिन श्वेता जोकि कनिका से बहुत नफरत करती है,,,,,
वह अपनी खुद की संगी मा नंदिता और कनिका की सूरत तक नहीं देखना चाहती,,,,,,
जब भी कोई श्वेता से कहता है कि कनिका उसकी बहन है तो श्वेता गुस्से में कहती यह उसकी कुछ नहीं लगती मेरी दादी कहती है यह एक नाजायज है और नाजायज से मेरा कोई रिश्ता नहीं है यह कहते हुए बह गुस्से में उठकर वहां से चली जाती,,,,,
अपनी बहन के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर कनिका के आंसू निकल आते,,,,,,
अपनी बहन अपने दादा दादी पिता किसी की भी प्यार भरी बातें उसने आज तक नहीं सुनी उसका तो जन्म भी नहीं हुआ था उससे पहले ही उन लोगों ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया था,,,,,,
क्या वह एक नाजायज है क्या बे लोग जिन्हें उसकी मां परिवार कहती है उसका संगा परिवार नहीं है अगर बह उसका सगा परिवार नहीं है तो कौन है उसका सगा,,,,,, यह बात उसे समझ में नहीं आती आखिर ऐसी क्या कहानी है इन सब के पीछे यह बह नहीं जानती,,,,,,,
लेकिन कनिका अब धीरे-धीरे समझदार हो रही थी गांव के लोगों की उल्टी सीधी बातें उसे काफी तकलीफ देती थी,,,,,,
जब भी वह बचपन में गांव के लोगों की बातें सुनकर अपनी मां को बताती तो उसकी मां को बड़े प्यार से उसे चुप करवा देती,,,,,
शायद उसकी मां के पास भी इन सब बातों का कोई जवाब नहीं था या बह उसे कुछ बताना नहीं चाहती थी कनिका को यह देखकर कुछ समझ नहीं आता,,,,,,
लेकिन अब दिनों दिन कनिका लोगों की बातों को सुनकर अंदर ही अंदर घुटती जाती है,,,,,,,
बचपन से लेकर आज तक उसके इस सवाल पर कि आखिर मां क्यों लोग हमारे बारे में ऐसा उल्टा सीधा बोलते हैं क्यों मुझे नाजायज और आपको बदचलन के नाम से बुलाया जाता है,,,,,,
ऐसी कौन सी बात है जो अब तक मुझसे छुपी हुई है बताओ मां यह भी हमेशा अपनी मां से पूछना चाहती लेकिन उसकी मां को कोई तकलीफ ना हो उसे कोई ठेस ना पहुंचे इसलिए चाह कर भी कुछ पूछ नहीं पाती,,,,,,
एक दिन कनिका बेटा देखो और जाओ हमें स्नान करने के लिए नदी पर भी जाना है और आज मुझे शहर के लिए जल्दी निकलना है तुम्हें भी तो स्कूल जाना है चलो जल्दी से उठ जाओ,,,,,, नंदिता अपनी बेटी कनिका को नींद से उठाते हुए बोली,,,,,,,
तब अपनी मां की आवाज सुनकर कनिका ने आंखें खोली और प्यार से अपनी मां की तरफ देखा तो उसकी मां ने उसका प्यार से माथा चूम लिया और बोली अब जल्दी से उठ जाओ,,,,,,
यह सुनकर कनिका बोली जी मां और वह अपनी मां के साथ नदी की तरफ चल दी,,,,,,
तब रास्ते में जाते हुए नंदिता बोली बेटा मैंने खाना बना कर रख दिया है जैसे ही हम नदी से स्नान करके आएंगे,,,,,,
तब भगवान जी की पूजा अर्चना करने के बाद में शहर के लिए निकल जाऊंगी फिर बस नहीं मिलती है उसके बाद 4 दिन बाद जाना होगा, अगर तुम्हें कुछ चाहिए तो बोल दो,,,,,,
यह सुनकर कनिका बोली नहीं मां मुझे कुछ नहीं चाहिए,,,,,
तब नंदिता बोली ठीक है लेकिन हां तुम समय पर नाश्ता करके स्कूल के लिए निकल जाना और हां रास्ते में अच्छे से जाना कहीं गिर मत जाना,,,,,,,
तब यह सुनकर कनिका बोली मां अब मैं बड़ी बात हो गई हूं कोई बच्ची नहीं हूं अब मैं दसवीं क्लास मैं आ गई हूं आप तो मुझे अब भी छोटी बच्ची ही समझती है,,,,,,
तब यह सुनकर नंदिता बोली अरे बच्चे तो हमेशा मां-बाप के लिए बच्चे ही होते हैं चाहे कितने भी बड़े हो जाए,,,,,,
यह कहते हुए दोनों मां बेटी नदी पर पहुंच गई वहां पर जाकर स्नान करने लगी,,,,,,
कुछ ही देर में नदी पर से स्नान करके दोनों मां बेटी घर पर आ गई,,,,,,
फिर भगवान की पूजा अर्चना करके नंदिता ने अपनी बेटी कनिका को अपने हाथों से खाना खिलाया और शहर जाने की तैयारी करने लगी,,,,,,
बह कनिका से बोली बेटा रास्ते में ठीक तरह से आना जाना कहीं ठोकर खाकर गिर मत जाना,,,,,,
वापस घर आकर खाना खाकर पढ़ाई कर लेना मैं शाम तक वापस लौट आऊंगी तुम्हें तो पता है ना यहां से शहर जाने आने के तीन चार घंटे लग जाते हैं,,,,,,
तब यह सुनकर कनिका बोली जी मां,,,,,,
फिर दोनों मां बेटी ने साथ-साथ खाना खाया उसके बाद कनिका स्कूल के लिए रवाना हो गई और नंदिता शहर जाने के लिए रवाना हो गई,,,,,
बही शाम को जब नंदिता घर वापस लौटी तो देखा कि कनिका स्कूल से वापस आ गई थी और घर का बाकी का काम कर लिया था और अपनी पढ़ाई कर रही थी,,,,,,,
तब यह देखकर नंदिता के चेहरे पर मुस्कान आ गई उसने अपनी थैले में से कुछ सामान बाहर निकाला और एक मिठाई का डिब्बा नंदिता की तरह बढ़ाते हुए बोली यह लो तुम्हारी पसंद के खीर मोहन है तुम्हें बहुत पसंद है ना,,,,,,,
तब यह सुनकर कनिका के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वह अपनी मां के गले लग गई,,,,,,