प्रथम परिच्छेद — मित्रों की बातचीत
भरित नेह-नभ-नीर नित बरसत सुरस अघोर ;
जयति अपूरण घन कोऊ, लखि नाचत मन-मोर ।
गरमी की ऋतु थी, सायंकाल का समय । सूर्य अस्ताचल
चले गए थे । पहाड़ से मकान ज्वालामुखी हो रहे थे, अर्थात्
उनके पत्थर ऐसे तप गए थे कि उनमें से लपटें निकलती थीं,
और गरमी का अंत न था । उस समय मदनमोहन अपने
मित्र माधव को साथ लेकर हवा खाने निकला । दोनों
बाजार की सैर और आपस में कुछ बातें करते हुए चले
जाते थे । मदनमोहन ने कहा--'"मित्र ! धन्य हैं ये बेचारे
दूकानदार जो गरमी में भी बैठे हुए अपना काम कर रहे हैं,
और पसीने से सराबोर हैं। पंखा भी नहीं है, परंतु कुछ नहीं
घबराते, मानो इनके लिये गरमी है ही नहीं । पसीना पोंछते
भी नहीं । धन्य है ईश्वर को, जिसने संसार में सब तरह के
मनुष्य बनाए, वास्तव में उसके सभी काम विचित्र हैं !"
माधव ने कहा "हाँ, इसमें संदेह नहीं कि ईश्वर की सब
बातें विचित्र हैं, परंतु गरमी सरदी न मालूम होना, यह केवल
अभ्यास ही है । इन्हें ऐसा ही नित्य करते-करते अभ्यास
हो गया है । अब इन्हें कुछ भी कष्ट नहीं होता । यदि तुम
भी इसका अभ्यास करो, तो कुछ दिन तक अवश्य कष्ट मालूम
होगा, परंतु फिर तुम्हें कुछ भी कष्ट न होगा ।"
इसी तरह बातें करते हुए ये लोग बारा में पहुँचे, और वहाँ
कुछ देर तक टहलते रहे। फिर तिपाई पर बैठकर बात
करने लगे । मदनमोहन जाति का वैश्य था, और इसका पिता
इसे एक ही बरस का छोड़कर मर गया था । इसका भाई भी
अपने पिता के मरने के पीछे थोड़े ही दिन में मर गया ।
इसे माँ ने पाला था । न तो यह धनाढ्य ही था न दरिद्र, २०
बरस का एक मध्यम अवस्था का मनुष्य था । इसकी शिक्षा
बहुत अच्छी हुई थी, और यह भारतवर्ष का बड़ा ही
शुभचिंतक था । माधव कैसा मनुष्य था, यह पाठकगण आप
ही विचार लेंगे, क्योंकि वह सुशिक्षित मदनमोहन का परम
प्रिय मित्र था ।
मदनमोहन ने कहा - " मित्र ! देखो, भारतवर्ष की कैसी
दुर्दशा हो रही है, यहाँ के मनुष्य कैसे आलसी, कायर और
मूर्ख हो गए हैं। ये दोनों मनुष्य, जो वृक्ष के नीचे बैठे थे,
कैसी बातें कर रहे थे । एक ने कहा--'भाई, हमरे लड़का के
बहुत लोग कहिन कि अँगरेजी पढ़ाओ, पर हम नाहीं पढ़ाया ।"
दूसरे ने पूछा- 'काहे ?' उसने उत्तर दिया- 'का तू नाही
जनत्यो, देखो, रामचंद अँगरेजी पढ़िन न, बेमजहब होय गए ।
ऐसा सुना है कि अँगरेज लोगन के साथ खाय लेथे, और
याक पोथिउ बनाइन हैं, वहिमाँ लिखिन है कि अँगरेजन के
साथ खाए में कुछ हरज नाहीं । ई किरिस्तानी मत नाहीं,
तो और का है ?"
दूसरे ने कहा - "न हम अँगरेजी पढ़ा, न हमरे पुरुखा लोग
अँगरेजी पढ़िन, फिर जो ऊ पढ़िहै, तो का ओके हमहू
लोगन से जादे अक्किल आय जैहे । ई सब बातन के
सोच के हम ओके अँगरेजी- पारसी कुछ नाहीं पढ़ावा,
खाली अपना काम सिखाय दिया ।"
दूसरे ने कहा- "हाँ, और का, रामजी रक्खे चार दिन
में सियाने होय जैहैं, तो
अपना सब काम-काज तो निकाल
लेइहैं, नहीं तो पाँच-छः बरस अँगरेजी पढ़ें, ताबों कोई काम
का सहूर न आवै । अच्छा, चलो, अब साँझ भई, कोठो चलै
के है ।"
हा ! जहाँ के लोगों की ऐसी बुद्धि है, वहाँ की उन्नति
कैसे होगी ? ईश्वर आजकल न मालूम क्यों हम लोगों
पर रूठा है। आगे तो हम लोगों के पूर्व-पुरुषों पर
बहुत ही प्रसन्न था, किंतु जब से हज़रत मुसलमानों के
कदम-शरीफ यहाँ आए, तभी से सब चौका लगा । सच
है - "जहाँ-जहाँ चरन परे संतन के, तहाँ-तहाँ बंटाधार ।" हमें
आशा थी कि सरकारी राज्य में ये लोग अवश्य सुधर जायँगे,
परंतु इनके राज्य में तो ये लोग और भी सत्यानास हो गए ।
मेरी समझ में इसका कारण यही मालूम होता है कि मुसलमान
लोग इन्हें बहुत कष्ट देते थे, इसलिये ये सदा नए-नए
उपाय अपने बचाव के सोचा करते थे, और अपना धन, धर्म
इत्यादि बचाने के लिये उद्योग करते थे । लड़ते, मरते और
अपनी रक्षा के लिये सभी कुछ करते थे, और इसी से ये लोग
उद्योगी, साहसी और बुद्धिमान् होते थे । परंतु न अब इन्हें
किसी बात का कष्ट है, न इनका कोई शत्रु है, जिसका डर हो ।
बस, फिर क्या पूछना है, चैन से कटने लगी । खाना-पीना
और बेपरवाह पड़े रहना, व्यर्थ को अहंकार किया करना
कि पूर्व पुरुष ऐसे थे, वैसे थे, हमारी बराबरी कोई कर
सकता है ? बस, इसी मद में चूर पड़े रहना, न किसी
बात का उद्योग करना, न कुछ समझना - सोचना । इन
पर यह मसल बहुत ठीक घटती है कि "हमारे बाप
ने घी खाया, हमारा हाथ सूँघ लो !" अब इन लोगों
को फिर से सुधारने में बड़ा भारी उद्योग करना
पड़ेगा, तब कदाचित् कुछ हो, सो इसकी भी पूर्ण आशा
नहीं, क्योंकि ये लोग चिकने घड़े की तरह हैं, पानी पड़ा
और साफ़ ।
माधव ने आह भरकर कहा - "इसमें क्या संदेह है, इस
देश की बहुत ही बुरी दशा है। इसके सुधरने की आशा
बहुत ही थोड़ी है । आहा ! ईश्वर भी क्या ही विचित्र तमाशा
किया करता है। यही भारतवर्ष, जो सब देशों में श्रेष्ठ था, अब
सबसे बुरा हो रहा है । हम लोगों के पूर्व पुरुषों ने जो-जो
बातें अच्छी निकाली थीं, वे ही सब अब बुरी हो रही हैं ।
निस्संदेह यहाँ के-से मूढ़ लोग कहीं न होंगे। इस देश के लोग
बड़े ही कृतघ्न हैं । जो कोई इनका कुछ उपकार करता है,
उसी को ये लोग बुरा बनाते हैं । 'जाके लिये चोरी करो, वही
बनावे चोर !' कैसे किसी का जी बढ़े, जो इनके लिये
कुछ उद्योग करे । हा ! ईश्वर, तू ऐसा विमुख क्यों हो रहा है
कि अपनी प्रजा की ऐसी दशा देखकर भी निश्चिंत बैठा है ।
मित्र ! तुमने जगद्विख्यात कविवर श्रीयुत बाबू हरिश्चंद्रजी
भारतेंदु की बनाई हुई 'भारतजननी' और 'भारत-दुर्दशा'
देखी है या नहीं ? उसमें कवि ने भारतवर्ष की अवस्था बहुत
ही अच्छी तरह लिखी है ।"
ये लोग इसी तरह बातें कर रहे थे कि मदनमोहन एका-
एकी चौंक उठा, और बोला -- "चुप-चुप, वह देखो, चाचाजी
आते हैं। यदि वह सुन लेंगे, तो बड़े ही रुष्ट होंगे। वह प्रायः
मुझसे कहा करते हैं कि तुम सब चौपट करोगे । हर वक्त
हाहा-ठीठी, गपशप किया करते हो, कहीं कोई किताब ले
बैठते हो, कहीं अखबार, काम-काज में तो जी नहीं लगता ।
इससे उनके आने के पहले ही यहाँ से चले चलना अच्छा
होगा । अब रात भी हो गई है । चलो ।"
ये दोनों वहाँ से उठे और बहुत धीरे से उनकी आँख
बचाकर निकल गए ।
बाहर आकर मदनमोहन ने कहा - " मित्र ! कल 'भारत-
हितैषिणी' सभा होगी। उसमें भारत की वर्तमान दशा पर वक्तृता
देने के लिये सभा से मुझे आज्ञा हुई है । सो मैंने इस विषय
में अपने शक्त्यनुसार कुछ लिखा है । वह कल सभा में पढ़ूँगा ।
तुम कल सभा में अवश्य आना ।"
माधव ने आना स्वीकार किया, और वे दोनों अपने-अपने
घर गए ।