द्वितीय परिच्छेद — सावजी की कोठरी
रात को १० बज गया था । प्रायः सब दुकानदारों ने दूकानें
बंद कर दी थीं । गरमी के कारण सड़क पर बहुत कम मनुष्य
दिखाई देते थे । मदनमोहन सोने जा चुका था । कोठी में
केवल एक गुमाश्ता बैठा हुआ पंखा हाँक रहा था। उस समय
मदनमोहन का चाचा सोहनलाल बाजार से होकर आया,
और गुमाश्ते से कहता हुआ चला गया कि "बही लेके हमरी
कोठरिया में आओ ।" उसके चले जाने के पीछे गुमाश्ते ने
कहा- "उन्हें हियाँ बैठत न-जाने का होथे कि जब देखो, तब
हुएँ गरमी में जाय बैठथैं ।" और बेचारा बही लेकर कुछ
बुड़बुड़ाता हुआ चला । नौकरी बड़ी बुरी चीज है, पेट के लिये
सभी कुछ करना पड़ता है। सोहनलाल की कोठरी का हाल
सुनिए -- अढ़ाई गज की लंबी, चौड़ी भी उतनी ही, और ऊँची
इतनी कि बिना सिर नीचा किए जो भीतर जाय, उसे तुरंत
यथोचित दंड मिले। एक बड़ा पुराना फटा टाट बिछा हुआ
था, और एक दीया, जिसमें एक ही बत्ती थी, जल रहा था ।
सोहनलाल बैठे थे । गुमाश्ता भी बही लिए हुए जा बैठा ।
गरमी का तो क्या पूछना था । ऐसा ज्ञात होता था कि उसे
संसार-भर में यही स्थान अच्छा लगा कि पूर्ण रूप से यहीं
आ बिराजी । दुर्गंधि के मारे नाक फटी जाती थी । पसीने
से शरीर और कपड़े की तो क्या बात है, टाट जो बिछा हुआ
था, भीग गया। यदि यह नरक कहा जाय, तो अनुचित न
होगा ।
सोहनलाल ने कहा-''आज की बिध मिलावे के है",
और दोनों मिलके बही देखने लगे । जब सब लिख गया,
तब उसे जोड़ने लगा । सब हिसाब मिल गया, केवल एक
पैसा घटा, उसके लिये घंटों तक सिर मारा । जब वह पैसा
भी याद आ गया, तब पिंड छोड़ा ।
सोहनलाल ने कहा- "मानिकचंद खुशालराम का लेखा
तो देखो, अब उनका कितना बाकी है ? "
गुमाश्ते ने बही उलट-पुलटकर देखी, और कुछ जोड़-जाड़कर
कहा --- "८६ रुपए, साढ़े दस आने बाकी हैं ।"
सोहनलाल ने कहा- 'अच्छा, अब कल देखा जैहे । "
थोड़ी देर पीछे सोहनलाल ने कहा- "कहो, अब हम
मदनमोहन का का करी, ओके कितनी समझाओ, कुछ सुनबैं
नाही करत । कितना कहा कि तू हमरे साथ बजार चला करो,
अपना काम-काज सीखो, दुइ-तीन सौदा कराय दिया, आठ-
दस आना मिल गया । न कोई की नौकरी न चाकरी, पर मनतै
नाहीं, हम करी सो का करी । हम तो ओके मारे तंग होय गए,
हाहा-ठीठी, खेल-कूद में दिन बितावना । आएदिन कुमेटी
लगी रही थी । हम तो जनबो नाहीं करते कि कुमेटी केके
कहैं । अबहिन तो नहीं मालूम होत, जब सिर पर पड़िहे,
तब जनिहैं । माथे पर हाथ धरके रोइहैं, और तब कहिहैं कि
कोई कुछ कहत रहा। हमें का चूल्हे छोड़ भाड़ में पड़ें। जैसा
करिहैं, वैसा आपे पड़ें ।"
गुमाश्ते ने कहा--"हम का बताई साहब, आप जो अच्छा
समझो, सो करो। हमें का हुकुम होथै ? अब हम जाई न ? "
सोहनलाल ने कहा "अच्छा, जाओ ।"
गुमाश्ता 'जाओ' यह शब्द सुनकर ऐसा प्रसन्न हुआ, जैसे
बड़ा धन मिल गया हो, और ऐसा प्रसन्न होकर चला, जैसे
कोई बंदीगृह से छूटा हो ।
गुमाश्ते के जाने पर सोहनलाल ने कहा--" चली, अब हमहू
सूती । सबेरेई गंगाजी नहाए जाए के है ।" और उठकर दिया
बुझाकर, किवाड़ बंद करता हुआ ऊपर चला गया । लेखनी ने
भी उस नरक से छुट्टी पाई ।