निःसहाय हिन्दू Ch. 3

तृतीय परिच्छेद — भारत-हितैषिणी सभा

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 02, 2026 09:23 PM

पाँच बज गया था । 'भारत-हितैषिणी सभा' के प्रायः सब

सभासद आ चुके थे । मदनमोहन वक्ता (लेक्चरर) था,

इसलिये वह सभापति की आज्ञा से उठा, और अपने लिखे

हुए व्याख्यान को उसने पढ़ना आरंभ किया ।

( व्याख्यान )

सभ्य महोदयगण !

आज आप लोगों ने मुझे कृपा करके 'भारतवर्ष की वर्तमान

दशा' पर कुछ कहने के लिये आज्ञा दी है। इसलिये मैं आप

लोगों को धन्यवाद देकर और आप लोगों के अमूल्य समय

को अपने निरसतावाद से नष्ट करने की क्षमा माँगकर आज्ञा का

प्रतिपालन करता हूँ । आप लोगों को यह भली भाँति ज्ञात होगा

कि काल-चक्र किसी को भी एक अवस्था में नहीं रहने देता ।

जो धनाढ्य थे, वे भिखारी हैं; जो भिखारी थे, वे धनाढ्य हैं;

जो राजा थे, वे प्रजा; जो प्रजा थे, वे राजा; जो खड़ा है, वह

बैठेगा, जो बैठा है, वह खड़ा होगा; जो चढ़ा है, वह उतरेगा;

जो उत्पन्न हुआ है, वह मरेगा; जिसकी उन्नति है, उसकी

अवनति होगी, जिसकी अवनति है, उसकी उन्नति होगी; जो

सुखी है, वह दुखी होगा; जो दुखी है, वह सुखी होगा। इसी

तरह संसार की जितनी वस्तुएँ हैं, सभी ऐसी हैं । यदि सबका

वर्णन किया जाय, तो एक बड़ी भारी पुस्तक हो जाय । देखिए,

सूर्यनारायण जो संसार के जीवनाधार हैं, और जिनके बराबर

संसार में कोई नहीं है, वह भी घटते और बढ़ते रहते हैं,

अर्थात् सबेरे से दोपहर तक बढ़ते हैं, और फिर धीरे-धीरे घट

जाते हैं, यहाँ तक कि मालूम नहीं होता कि सूर्य भी कोई

वस्तु है । इसी तरह संसार में जितने देश हैं, जो कि इस समय

पूर्ण सभ्यता की अवस्था में हैं, किसी समय असभ्य थे ।

कदाचित् इन्हीं उन्नति और अवनति के समयों को पुराण में

सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग लिखा है । इस काल चक्र के

फेर-फार में यह भारतवर्ष, जो किसी समय पूर्णोन्नति की

अवस्था में था, अब पूर्ण अवनति की अवस्था में है । हा !

इस भारतवर्ष की अब क्या दशा हो गई है । हे भारत-भूमि !

क्या तू अब वह भूमि नहीं है ? हे भारतवासी ! क्या तुम

उन आर्यों के वंश में नहीं रह गए ? हे देवतागण ! क्या

अब आप लोग देवता नहीं हैं ? हे कृपानिधान ईश्वर ! क्या

अब तू कृपानिधान नहीं है । हे दयासिंधु ! क्या अब तू

सचमुच निर्दय हो गया ? क्या तुझमें अब दया का लेश-मात्र

भी नहीं रहा ? भारतवर्ष की कैसी दुरवस्था है ? हा ! यह भारत-

वर्ष सारे संसार में श्रेष्ठ था । अब सभी इससे घृणा करते

हैं । अब वे प्राचीन महात्मा लोग, जिनसे भारतवर्ष की

उन्नति थी, कहाँ चले दिए ? हे भगवान, श्रीरामचंद्रजी

और श्रीकृष्णचंद्रजी अब आप लोग कहाँ हैं ? अब भारत-

वर्ष को क्यों भूल गए ? हे महाराजा हरिश्चंद्र, युधिष्ठिर,

भीम, करण, दधीचि, परशुराम, विश्वामित्र, खुमानराय,

शिवाजी, मानसिंह इत्यादि शूर-वीर भारतवर्ष से, जो आप

लोगों का बड़ा ही प्रिय था, क्यों इतने दुखी हो गए ? हे

परम पूजनीय ब्राह्मण महाशय ! अपने पूर्वजों को स्मरण

करो, और दीन भारतवासियों को सदुपदेश से इस अज्ञान-

रूपी महासागर से निकालो ।

हे क्षत्री लोग ! अब तो चेतो । जो तुम्हारे पूर्व-पुरुष

स्वतंत्र राज्य करते थे, उन्हीं के वंश में तुम लोग भी हो। क्या

इतने पर भी लज्जा नहीं आती ? हे वैश्य महाशय ! सारा

धन परदेशी लोग लिए जाते हैं, तिस पर भी तुम लोग

अपने कार्य में तत्पर नहीं होते ? हा ! क्या यह वही

भारतवर्ष है, जिसमें बड़े-बड़े महात्मा हुए हैं ? निस्संदेह अब

भारतवासियों के रोने का समय आ गया ।

रोअहु सब मिलिकै, आवहु भारत भाई ;

हा हा ! भारत दुर्दशा न देखी जाई ।

सबसे पहले जेहि ईश्वर धन-बल दीनो;

सबके पहले जेहि सभ्य विधाता कीनो ।

सबके पहले जो रूप-रंग-रस भीनो;

सबके पहले विद्या-फल जिन गहि लीनो ।

अब सबके पीछे सोई परत लखाई ;

हा-हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई ।

जहँ भए शाक्य, हरिचंद रु नहुष, ययाती ;

जहँ भए युधिष्ठिर, व्यासदेव सर्याति ।

जहँ भीम, करन, अरजुन की छटा देखाती ;

तहँ रही मूढ़ता, कलह, अविद्या राती ।

अब जहँ देखहु तहँ दुःखहि दुःख लखाई ;

हा-हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई ।

लरि वैदिक, जैन डुबाई पुस्तक सारी ;

करि कलह बुलाई जवन-सैन पुनि भारी ।

तिन नासी बुधि, बल, विद्या, धन बहु बारी ;

छाई अब आलस-कुमति-कलह-अँधियारी ।

भए अंध पंगु सब दीन-हीन बिलखाई ;

हा-हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई ।

अँगरेज-राज सुख-साज सजे सब भारी ;

पै धन बिदेश चलि जात यहै अति ख्वारी ।

ताहू पै महँगी, काल, रोग बिस्तारी ;

दिन-दिन दूनो दुख देत ईस हा हा री ।

सबके ऊपर टिक्कस की आफत आई ;

हा-हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई ।

अब इस भारतवर्ष की जैसी दुर्दशा है, वह आप लोगों पर

विदित हो ही गया, इसमें विशेष कहने की कुछ आवश्यकता

नहीं । अब मैं इन दुर्दशाओं का कारण, जो कुछ मेरी क्षुद्र

बुद्धि में आया, लिखता हूँ । मेरी समझ में इन सब

दुरवस्थाओं के कारण ब्राह्मण और मुसलमान लोग हैं। सबसे

पहले ब्राह्मणों ही ने सब चौपट किया, क्योंकि पहले जब

भारतवर्ष स्वतंत्र था, और इसे किसी का भय न था, तब

लोग निश्चिंत हो अपना-अपना कार्य करते थे । ब्राह्मण लोग

धर्मोपदेश और धर्म की रक्षा, राजा लोग प्रजा की रक्षा, वैश्य

लोग धनोपार्जन, धन की रक्षा और शूद्र लोग अन्न उत्पन्न

करते थे। धर्म के विषय में जो ब्राह्मण लोग कहते थे, उसे

साक्षात् ईश्वर का वाक्य मान लेते थे । यह मैं पहले ही सिद्ध

कर चुका हूँ कि सब एक ही अवस्था में नहीं रहते । ब्राह्मणों

के वंश में भी सभी अच्छे नहीं होते थे । जब ब्राह्मणों को

तृष्णा विशेष हुई, तब उन्होंने वृथा का आडंबर फैलाना प्रारंभ

किया, और लोग मानने लगे । अंत में ब्राह्मणों ने इस जाल

को ऐसा फैलाया कि सभी बातों में धर्म आ घुसा

( इससे मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि धर्म कोई वस्तु नहीं,

इसे न मानना चाहिए, वरंच इससे मेरा यह अभिप्राय है

कि धर्म वहीं तक ठीक है, जहाँ तक हानि न हो, जब

हानि हुई, तब वह धर्म क्या अधर्म है ) । इस धर्म का पचड़ा

इतना बढ़ गया कि बाप बेटा का छुआ न खाय, और बेटा

बाप का । इसका फल बहुत ही बुरा हुआ, अर्थात् जब बाप

बेटे ही में भेद पड़ गया, तब फिर और किसकी बात है ।

इन्हीं आचार्यों के कारण हजारों मत प्रचलित हो गए, और

उनमें ऐसा विरोध फैला कि घर में चार आदमी हैं, तो चारों

का जुदा-जुदा मत; नित्य इसी मत का पचड़ा घर में फैला

हुआ है । स्त्री पति से इसी मत के लिये बुरा मानती है, और

पति - स्त्री से । इसका फल यह हुआ कि सत्य धर्म धीरे-धीरे लोप

होने लगे, और असत्य की विशेषता हुई । फूट महारानी को तो

बहुत ही अच्छा समय मिला, आ बिराजीं, और धीरे-धीरे

अपना प्रभुत्व दिखाने लगीं । अब घर-घर कलह हो रही है ।

स्त्री पति का और पति स्त्री का मुख देखना नहीं चाहते । एका

ने जब देखा कि यहाँ तो कुछ का कुछ हो गया, अब मेरा यहाँ

निर्वाह नहीं, निकल भागा । बल का हाल सुनिए । महीने में

पंद्रह दिन भूखे रहना पड़ा। आज यह व्रत है कल वह । बाल्यावस्था

में विवाह होने लगा । **** इस तरह नाश हुआ । अब

बल बेचारा कहाँ ठहर सकता । इसने भी इस्तीफा दिया ।

उद्योग ने कहा, जब मेरे पिता ही ने 'इस्तीफा' दिया, तब हम

यहाँ कैसे रह सकते हैं । वह भी लुटिया-बर्तन ले रफू-

चक्कर हुआ । साहस भी उसी के साथ चल दिया । जब ये दोनों

चले गए, तब आलस्य महाराज ने अपना डंका बजाया । फिर

विद्या बेचारी कैसे रह सकती थी । उसने भी भागना चाहा ।

बुद्धि भी अपनी बड़ी बहन को जाते देख उसके साथ चल दी ।

तब फूट, आलस्य, अविद्या, अज्ञानता इत्यादि का राज्य जम

गया। रोग महाराज ने भी इन लोगों की शरण ली। बस, बचा

क्या था, केवल धन । उसको नाश करने के लिये हज़रत मुसल-

मानों का पौरा आया, जिसने अच्छी तरह चौका लगाया । मुसल-

मानों के आने की अवस्था सुनिए । फूट की तो जड़ जमी ही

थी । पृथ्वीराज और जयचंद में लड़ाई हुई । जयचंद ने अपनी

सहायता के लिये मुसलमानों को बुलाया, और अंत में दो

के दोनों को मार मुसलमान लोग आप ही राजा बन बैठे, और

हिंदुओं पर अत्याचार करने लगे, और धन को ले-लेकर, उन्होंने

विदेश भेजना प्रारंभ किया । हिंदुओं के हाथ में एकमात्र धन ही जो

कुछ था, सो था । यह भी धीरे-धीरे खसकने लगा । हिंदुस्थान के

इतिहास को देखिए । एक-एक मुसलमान लुटेरे बादशाह यहाँ से

कितना-कितना धन ले गए । यहाँ तक कि हिंदुस्थान को बिलकुल

खोखला कर दिया । धर्म में इन लोगों ने ऐसी बाधा डाली, जिसे

सुनकर रोएँ खड़े हो जाते हैं और जी काँपने लगता है । इन लोगों

ने बड़े-बड़े मंदिर तोड़े, और मंदिरों की जगह मसजिदें बनवा

दी । महमूद गजनवी ने सोमनाथ महादेव का मंदिर तोड़ डाला,

और महादेवजी की मूर्ति के चार टुकड़े कर एक को मक्का,

दूसरे को मदीना भेज दिया, तीसरे को अपने सहन की सीढ़ी पर

और चौथे को मसजिद की सीढ़ी पर लगा दिया । हा ! ईश्वर ने

कैसा मौन साधन कर लिया है। मुसलमानों ने जो-जो अत्याचार

किए हैं, वे जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर हैं, तब तक हिंदुओं

को न भूलेंगे। ऐसा कौन हिंदू होगा, जो इन लोगों के

अत्याचार को न जानता होगा, और उससे न दुखी होगा । मुसल-

मानों का तो धर्म ही क्रूर है, उनके मत का यह मुख्य वाक्य है

कि 'काफिर को मारने से बिहिश्त मिलता है ।' यदि उन्होंने

ऐसा किया, तो कौन-सा आश्चर्य है, जब कि हिंदुओं के परम

पूज्य, विश्वासपात्र ब्राह्मणों ने स्वार्थपरायण होकर चौपट

कर दिया । इस चौका लगाने और छुआछूत से कैसा

कुछ चौका लग गया । इस वेदांत मत ने सबको ब्रह्म

बनाकर कैसा चौपट किया है कि जिसका वर्णन नहीं हो

सकता ।

रचि बहु बिधि के वाक्य पुरानन माँहि घुसाए;

शैव, शाक्त, वैष्णव अनेक मत प्रकट चलाए ।

जाति अनेकन करी, नीच अरु ऊँच बनायो ;

खान-पान-संबंध सबन को बरजि छुड़ायो ।

जन्म-पत्र-विधि मिले ब्याह नहिं होन देत अब ;

बालकपन में ब्याहि देह-बल नाश किए सब ।

करि कुलीन के बहुत ब्याह बल-वीरज मारयो ;

विधवा-ब्याह-निषेध कियो, बिभिचार प्रचारयो ।

रोकि विलायत-गमन कूप-मंडूक बनायो ;

औरन को संसर्ग छुड़ाइ प्रचार घटायो ।

बहु देवी, देवता, भूत, प्रेतादि पुजाई ;

ईश्वर सों सब बिमुख किए हिंदू घबराई ।

अपरस सोलहा छूत रचि भोजन-प्रीत छोड़ाय ;

किए तीन-तेरह सबै चौका-चौका लाय ।

रचि कै मत वेदांत को सबको ब्रह्म बनाय ;

हिंदुन पुरुषोत्तम कियो तोरि हाथ अरु पाय ।

परंतु बड़े ही आश्चर्य की बात है कि जिन ब्राह्मणों के

२५६ करोड़ देवता रक्षक थे, उनके रहते ही विदेशियों ने राज्य

छीनकर धर्म में भी इतनी बाधा की कि सब मुँह देखते ही रह

गए, कुछ भी बन न पड़ा । हा ! इन्हीं सब कारणों से हिंदुओं

की यह दशा हुई, और वे अब तक भी नहीं चेतते । इन लोगों

ने तो यही सिद्धांत कर लिया है-

मिल जाय हिंद खाक में, हम काहिलों को क्या ;

ऐ मीर, फ़र्श रंज उठाना नहीं अच्छा ।

हिंदुओं की दुर्दशा उनके कर्म ही से है। जो इनके शत्रु हैं,

उन्हें भी ये लोग मानते हैं । गाजीमियाँ, जो इन लोगों का

बड़ा भारी शत्रु था, और जिस दुष्ट ने सोमनाथ महादेव की

मूर्ति तोड़ी, उसी को बहुत-से हिंदू लोग पूजते हैं ! महमूद

गजनवी ने तो दो करोड़ रुपए लेने पर मूर्ति न तोड़ना

स्वीकार भी किया था, परंतु इसी दुष्ट ने रोक दिया । हा !

हिंदुओं की बुद्धि न जाने कैसी हो गई है, जिसका यह सब

फल है।

इनसे अधिक भाग्यहीन और कौन होगा कि अँगरेजों का

राज्य पाकर भी न सुधरे ? तब तो यह था कि मुसलमानों के

भय से सदा सशंकित रहते थे, अब तो इन्हें किसी बात का

भी भय नहीं है । न इनके राज्य में धर्म-विषयों में कोई बाधा

डाल सकता है, और न डाका ही पड़ने का कुछ भय है ।

अब तो चारों ओर से सुख-ही-सुख है, और उन्नति करने के

लिये फाटक खुला है, परंतु इतने पर भी कुछ नहीं चेतते । यही

तो खेद है! हा! ऐसा कौन-सा मूर्ख होगा कि थोड़े कष्ट से

जो बहुत सुख हो, तो भी उस कष्ट को सहकर सुख के खजाने

को न ढूँढ़े ? सुधरेंगे कहाँ से, बुद्धि तो पहले ही से नष्ट हो

गई है। उनसे यदि कुछ सीखा भी, तो वही कोट, बूट,

पतलून, चुरूट, शराब, आराम, अभिमान इत्यादि दोषों के

सिवा और कुछ नहीं । मैं देखता हूँ कि सुधरना क्या, वरन्

अँगरेजों के राज्य में तो और भी बिगड़ गए। बच्चा-बचाया

धन, उद्योग इत्यादि भी जाता रहा । व्यभिचार, कलह, इत्यादि की

वृद्धि हुई, और रहा-सहा सब सफाचट हो गया । ऐसे अच्छे

समय में उन्हीं लोगों की उन्नति होती है, जिनको कुछ बुद्धि

होती है । यहाँ तो बुद्धि को पहले ही से तिलांजलि है-

"यहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ।" फिर उन्नति कैसे हो सकती

है, और भी अवनति होने लगी । कहिए क्या ? तो इसका

कारण यह है कि मुसलमानों के समय में सब तरह का भय

रहता था, इससे लोग उद्योगी, बुद्धिमान् बने रहते थे । अब

भय न रहने से आनंद से सोना प्रारंभ किया, और उद्योग

को निर्मूल छोड़कर भाग्य ही पर धरना दे बैठे, जिसका

परिणाम आप लोगों के सामने ही दिखाई देता है । जब

सरकार ने देखा कि इन्हें अपनी कुछ भी चिंता नहीं है, तब

उसे क्या पड़ी थी, जो वह विशेष उद्योग करती । जितना राजा

को चाहिए, उससे विशेष ही कर दिया, अर्थात् कॉलेज इत्यादि

बनवा दिए कि जिससे विद्या सीखें । परंतु इससे कुछ विशेष लाभ

न हुआ । लाभ हो कहाँ से, जब तक जी से नहीं लगती, तब तक

कुछ नहीं होता । फिर सरकार क्या-क्या करे ? बलवे में बे-बात

लड़कर सरकार को अपनी तरफ से ऐसा शंकित कर दिया कि

चटपट सब शस्त्र छीन लेने की आज्ञा हो गई। अब अपने बचाव

के लिये भी शस्त्र न रह गया । टैक्स लगाया गया कि जिससे

सारी प्रजा दुःखित हो रही है। भला ऐसे मूर्खों ही को छोड़

दें, तो किससे लें ? बेचारे समाचार-पत्रों ने जो कुछ कहना

प्रारंभ किया, प्रेस-ऐक्ट बन गया । बस, बोलो बचा क्या ? हा !

दुर्बल को सभी सताते हैं—'दुर्बलो देवघातकः' । ऐसी न्याय-

परायण गवर्नमेंट ने भी इन्हें तुच्छ समझा, तो रह क्या गई ?

मुसलमानों ने जब देखा कि गवर्नमेंट भी इन्हें नहीं मानती,

शस्त्र भी नहीं है, पैसा भी नहीं, तो गोवध इत्यादि महा

उपद्रव करना आरंभ कर दिया । कई लोगों ने नालिश भी

की, परंतु कौन सुनता है, रो बैठे । मुसलमानों ने दिन-दिन

उपद्रव उठाना प्रारंभ कर दिया । परंतु इन लोगों को इतने

पर भी न सूझा । हा ! ईश्वर का पूर्ण कोप इन्हीं लोगों पर

है । इन विषयों पर यदि विशेष ध्यान दिया जाय, और अच्छी

तरह लिखा जाय, तो एक बड़ी भारी पुस्तक हो जाय । अब

इस विषय को यहीं पर समाप्त करके आशा रखता हूँ कि

यदि इतने में कहीं भूल-चूक हो, तो उससे मुझे सचेत कीजिए

कि मैं फिर कभी ऐसी भूल न करूँ ।" मदनमोहन बैठ गया ।

( ताली बजी । )

मदनमोहन के बैठने पर माधव उठा। माधव ने कहा--- "बाबू

मदनमोहन ने जो कुछ कहा है, उसकी प्रशंसा करने की कोई

आवश्यकता नहीं, क्योंकि सब महाशयों पर विदित हो गया है ।

परंतु मैं इस सभा से निवेदन करता हूँ कि इसे केवल लंबी-चौड़ी

बातों ही पर संतोष न करना चाहिए, बल्कि इसका उपाय भी

सोचना चाहिए, और उद्योग भी करना चाहिए, क्योंकि इस

सभा का नाम 'भारत-हितैषिणी' ठहरा, तो इसके काम भी

इसके नाम के अनुसार होने चाहिए । ( ताली बजती है । )

आज बाबू मदनमोहन ने हम लोगों के लिये कष्ट करके बहुत

ही अच्छा व्याख्यान दिया है, इसलिये मैं उन्हें धन्यवाद देता

हूँ !” ( ताली बजी । ) माधव बैठा ।

एक सभासद् ने खड़े होकर कहा--"बाबू माधवप्रसाद ने जो

कुछ कहा, वह बहुत ही ठीक है । हम लोग सच्चे जी से बाबू

मदनमोहन को धन्यवाद देते हैं ! मेरी समझ में यदि भारत-

वर्ष की उन्नति के उपाय पर बाबू माधवप्रसाद ही आगत सभा

में कुछ कहते, तो बहुत अच्छा होता ।" ( ताली बजी । )

सभासद् बैठ गया ।

एक मुसलमान सभासद् - "बाबू मदनमोहन साहब ने जो

कुछ फर्माया, दरहक़ीक़त सच है । इसमें कुछ शक नहीं कि

मुसलमानों ने बेचारे हिंदुओं पर बड़ा-बड़ा जुल्म किया है,

जिसे मैं सरासर बेजा समझता हूँ, और आजकल भी

कुछ फसाद उठाया है । मैं सच्चे जी से हिंदुओं का शरीक हूँ,

क्योंकि इस वक़्त सरासर हिंदुओं पर जुल्म हो रहा है। बावजूदे

कि गोकुशी क़ुरान शरीफ में मना है, ताहम बहुत-से

बदमाश मुसलमानों ने हिंदुओं का जी दुखाने के लिये इसे

जारी रक्खा है । मैं क़सम खाकर कहता हूँ कि मैं इस बारे में

आपके साथ हूँ ।" ( तालियाँ बजीं ।) वह बैठा ।

सभापति - "मैं इसे प्रकट करने में बहुत ही आनंदित

होता हूँ कि मेरे मित्र मौलवी साहब ने उसके बिलकुल विरुद्ध

कहा, जैसा कि हम लोगों ने सोचा था । निस्संदेह मुसलमानों

की तरफ़ से यह बड़ा ही अन्याय-कर्म हुआ है । जिसके कुछ

भी बुद्धि होगी, वह कह सकेगा कि यह सरासर अन्याय है ।

मुझे बड़ा ही आश्चर्य है कि गवर्नमेंट ऐसी बातों पर क्यों

नहीं ध्यान देती ? गौयों का मारा जाना केवल धर्म-विरुद्ध ही

नहीं, वरन् इससे कृषि कर्म, आरोग्य आदि का भी बड़ा

अपकार होता है, परंतु इतने पर भी गवर्नमेंट ध्यान नहीं देती ।

हमारे हिंदू भाइयों के लिये यह बड़ी ही लज्जा की बात है कि

उन लोगों के सामने उनकी परम पूजनीया माँ की यह दशा

हो ! धिक्कार है कि बहुत-से मुसलमान इस अन्याय से चिढ़ें,

और हिंदुओं का इस पर कुछ भी ध्यान न हो । ( ताली

बजती है ।) बहुत-से लोग इस विषय में कहते हैं कि 'भई,

क्या करें, सरकार तो कुछ करती ही नहीं, हम क्या करें। क्या

हमारी जान मुफ्त की है कि बैठे-बैठाए ख़तरे में डाल दें ? फर्ज

करो कि मेहनत करने से गोहत्या कुछ कम हो, मगर उससे

क्या फायदा ?" हा ! उन मूर्खों को यह भी नहीं सूझता कि

हमारी खेती-बारी का काम बैलों ही से होता है । यदि बैल न

होंगे, तो कौन खेत में पानी देगा ? और यदि गऊ न रहेगी,

तो बैल कहाँ से आयेंगे ? धर्म की बात को तो जाने दीजिए,

इसी बात पर ध्यान दीजिए, तो देखिए, गऊ के न रहने से

कैसी हानि होगी ? अगली सभा में मैं अपने मित्र मौलवी

साहब से निवेदन करूँगा कि आप ही इस विषय पर

व्याख्यान दें । अब इस समय सभा विसर्जन की जाय ।"

( ताली बजी । ) सभापति बैठते हैं ।

सभापति को धन्यवाद देकर सब लोग उस मुसलमान की

प्रशंसा करते हुए अपने-अपने घर गए । निस्संदेह उस

मुसलमान ने पक्षपात शून्य न्याय किया । क्या हिंदुओं को

यह सब बात सुनकर भी लज्जा नहीं आती ?

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