माँ-बाप
२
माँ-बाप
रामपुर एक छोटा-सा गाँव था। उसके डेढ़ सौ घरों में अधिकांश राजपूतों के थे। खेती लायक भूमि मुश्किल से सौ एकड़ थी। गाँव के जमींदार राजपूत थे, यद्यपि जमींदारी बँट-बँटकर आध-एकड़, पाव-एकड़ रह गई थी। जमीन बलुआ और बहुत उपजाऊ न थी। लोग जिस ढंग से खेती करने के आदी थे, उससे अधिक उपज होना संभव न था। सत्तर घर राजपूतों में से बहुत कम ऐसे थे जिनका कोई व्यक्ति बाहर नौकरी करने न गया हो—पलटन और पुलिस में उनके बहुत से जवान थे। रामपुर के खाते-पीते घर वस्तुतः गाँव की खेती के भरोसे नहीं, नौकरी के सहारे गुजर-बसर करते थे। आस-पास के इलाकों में रामपुर के जवान दो बातों के लिए मशहूर थे, एक अपनी शारीरिक शक्ति, लम्बे-चौड़े डील-डौल और तन्दुरुस्ती के लिए, दूसरे मार-पीट और लाठी चलाने में। इन बातों में उनका मुकाबला दूसरा कोई न कर सकता था।
दो-ढाई रुपये महीने की आमदनी और डेढ़-दो एकड़ बालू-बंजर के खेत से लौटू सिंह के घर का गुजारा चलना मुश्किल था। राधा ने आमदनी के दो और रास्ते निकाल लिए थे। लौटू सिंह के घर बैल न था और न बैल रखने की उन्हें जरूरत ही थी। बरसात में काम करके या मोल के हल से वह अपने खेत को जोत-बो लेते थे। हाँ, राधा के पास बराबर चार बकरियाँ रहती थीं। हर बकरी साल में दो बार बच्चे जनती थी। प्रति बकरी के साल में पाँच-छै बच्चे होते थे जिन्हें सात-आठ महीना पालकर वह दो-दो रुपये में आसानी से बेच लिया करती। राधा को बकरियों से हर साल तीस-चालीस रुपये की आमदनी हो जाती थी। उसे सीने-पिरोने का काम भी अच्छा आता था। उसकी सिलाई ही अच्छी नहीं होती थी, बल्कि लाल-पीले कपड़ों की जोड़ से बेल-बूटा निकालकर वह बच्चों और स्त्रियों के कुर्ते- कुर्तियाँ, टोपी, तकिया के खोल - कई तरह की चीजें बनाती थी। दाम भी वह ज्यादा न चाहती थी, दो-तीन आने रोज मिल गए तो उसी से सन्तुष्ट। फेरी वाले बिसाती घर पर आकर उसकी चीजें मोल ले जाते थे।
राधा चटाई पर बैठी अपनी सिलाई में लगी थी। बगल में लड़की पार्वती कपड़े का टुकड़ा लेकर गुड़िया बना देने के लिए जिद कर रही थी। राधा को आज ही सीकर कुछ कपड़े देने थे, इसलिए वह पार्वती को बहलाने और बात में फँसाने की कोशिश कर रही थी। चटाई से कुछ हटकर एक खाँचे के नीचे बकरी के चार छोटे-छोटे बच्चे दबे हुए थे। एक जगह बकरियाँ बँधी थीं जिनके सामने पीपल के हरे-हरे पत्ते पड़े हुए थे। जाड़े का दिन छोटा होता है, इसलिए राधा को रसोई की चिन्ता थी। इसी से उसकी सुई और भी तेजी से चल रही थी।
राधा की उम्र अट्ठाइस बरस की होगी। कहने के लिए अभी वह युवती थी और उसके सिर्फ दो बच्चे हुए थे, लेकिन गरीबी और संसार के जीवन-संघर्ष ने उसे बहुत गंभीर और चिंताकुल बना दिया था। उसके चेहरे पर जवानी की बेपरवाही और प्रफुल्लता की जगह संजीदगी अधिक दिखाई पड़ती थी। तो भी राधा उन स्त्रियों में न थी जो चिंता की आग को खुद कई गुना बढ़ाकर रात-दिन उसमें सुलगा करती हैं। राधा के मिजाज में चिड़चिड़ापन छू नहीं गया था। किसी से बोलते वक्त वह सदा हँसमुख रहा करती थी। कोई दो बात कहे भी, तो उसे बर्दाश्त कर लेती थी। किसी झगड़ा करते उसे कभी किसी ने नहीं देखा। उसकी मधुर भाषिता का ही यह जादू था कि टोले की सभी स्त्रियाँ उसकी सखी और मित्र थीं। इतना सब होते हुए भी राधा में एक विशेष गुण था। वह अपनी सहेलियों की इतनी विश्वासपात्र थी कि सभी उसकी बात को बिना आनाकानी के मानने के लिए तैयार रहती थीं। स्त्रियों के आपसी झगड़ों को निपटाने के लिए वह बनी-बनाई पंच थी। ब्याह, उत्सव और पर्व में राधा की बहुत पूछ थी। गीत गाने में, गाँव में क्या अगर मुकाबला किया जाता तो आसपास के गाँवों में भी उसकी बराबरी करने वाली कोई स्त्री न मिलती। उसका कंठ मधुर, आवाज ठोस और तर्ज बड़ा सुन्दर था। कितने गीत उसे याद हैं, इसका भी उसे छोड़ दूसरों को पता न था। वह गीत गाने में ही गाँव की स्त्रियों की अगुआ न थी, बल्कि डोमकच में तो वह कमाल करती थी। डोमकच के अभिनय और नाच को सिर्फ स्त्रियाँ ही देख सकती हैं और पुरुष क्या, छोटे-छोटे बच्चे भी भीतर जाने नहीं पाते, लेकिन स्त्रियाँ कहती थीं कि राधा नाचने में बड़ी प्रवीण है। नकल करने में तो इतनी सफल कि एक बार होली के समय राधा ने साहेब का कपड़ा पहिन, एक दूसरी स्त्री को अर्दली बना, चाँदनी रात में लोगों के दरवाजों का निरीक्षण शुरू किया। उस समय जाड़ों में अक्सर प्लेग आ जाया करता था और सरकार की ओर से सफाई की बड़ी ताकीद थी। बूढ़े देवकुमार सिंह अपने ओसारे में चारपाई पर सोये थे। साहब बहादुर ने एकाएक वहाँ पहुँचकर छड़ी को दो-तीन बार चारपाई के पावे पर पटकते हुए कहा—
“वेल् डेवकुमार, टुम सोटा है। टुमारा डरवाजा बहुट गंदा। उट्टो-उट्टो।”
देवकुमार सिंह को अभी पहली नींद आई थी। घबराकर उठे और जब सामने टोपधारी साहब को देखा, तो उनके होश उड़ गये। वह बोलने के लिए कुछ सोच भी न पाए थे कि अर्दली चिल्ला उठा—
“कलट्टर साहब बहादुर को तू नहीं पहचानता? कैसा बेवकूफ है! साहब को सलाम नहीं करता?”
देवकुमार सिंह—“हु-हु-हुजूर, माई-बाप सलाम! माफ कीजिए।”
“माफ नहीं होटा। टुम नहीं जानटा, गाँव-गाँव में प्लेग फैला हाय, टुमारा डरवाजा पर नाबडान है।” छड़ी से धमकाते हुए—“अभी नाबडान साफ करो, साफ करना माँगटा?”
“हुजूर, अभी साफ करता हूँ”—देवकुमार सिंह की नींद तो न जाने कहाँ चली गई थी। वह घर में फावड़ा लाने घुसे। साहब बहादुर और अरदली बाहर टहल रहे थे और आस-पास की दीवारों की आड़ में जितने ही लोगों को हँसी का रोकना मुश्किल हो रहा था।
देवकुमार सिंह बाहर आए तो साहब बोल उठे - “सौ रुपया जुर्माना। बहुत गंडा।”
“हुजूर, गरीब आदमी हूँ, बाल-बच्चे मर जायेंगे। अभी साफ कर देता हूँ। फिर गंदा नहीं रक्खेंगे। जुर्माना माफ कर दें। दोहाई हुजूर की!” - देवकुमार सिंह साहब का पैर पकड़ना चाहते थे।
“हटो हटो, नहीं माफ होगा। पुलिस का नौकरी किया हाय, टुम छै रुपया पेंसन पाटा है, जुर्माना डेना होगा।”
“सरकार, गरीब परवर, अब कसूर नहीं होगा। एक कसूर माफ।”
“अच्चा, एक बार छोड डेटा हाय। नाबडान अभी साफ करो।”
देवकुमार सिंह फावड़ा लेकर नाबदान की नाँद की ओर बढ़े। उसमें गन्दा पानी भरा था। सोच रहे थे—क्या करें। इतने में ‘साहब’ बोले—
“क्या डेखटा, मट्टी डालो। टोकरी में भरो। क्या माँगटा? सिर पर उठाओ। जाओ, गाँव से बाहर दूर।”
रात चाँदनी जरूर थी, लेकिन आधी रात को गाँव से बाहर अकेले जाना देवकुमार सिंह के लिए आसान बात न थी। सबसे मुश्किल यह थी कि जिस ओर जाने के लिए ‘साहब’ बहादुर ने उन्हें इशारा किया, उधर रास्ते ही में, पीपल के पेड़ पर एक नट रहता था। यही वक्त है जब कि वह ताल ठोंका करता था। बड़े-बड़े ओझा और सयाने भी उस नट से परास्त रहते थे। देवकुमार सिंह का पैर आगे की अपेक्षा पीछे ही ज्यादा पड़ता था। लेकिन कलट्टर साहब, उनकी छड़ी और जुर्माना उन्हें खूब याद था। उस वक्त उनके मन ने यही कहा कि ‘कलट्टर’ साहब से जान बचाना जरूरी है, चाहे नट उसे मुफ्त में ही ले ले। पीपल के नीचे कुछ पत्तों का मर्मर शब्द हुआ। देवकुमार सिंह ने समझा कि नट तैयार है; तो भी वह जान पर खेलकर आगे बढ़े। देखा, काला साँड खड़ा है।
टोकरी फेंक कर सोचते आ रहे थे—कहाँ से यह कसाई ‘कलट्टर’ आया। अभी दो-तीन टोकरी फेंकनी होंगी। आज प्राण जरूर जायेंगे।
दरवाजे पर आकर देखते हैं, तो वहाँ स्त्रियों की भीड़ लगी है। सभी ठहाका मारकर हँस रही हैं - “राधा बहिनी ने खूब छकाया।”
देवकुमार सिंह ने जब सुना तो उन्हें बड़ी लज्जा आई। बोले - “अच्छा, भौजी, अब की बार तुम्हारी बारी रही; हमारा भी मौका आयेगा।”
दो बजे दिन का समय था। लौटू सिंह अपनी नौकरी पर साहू के घर गये हुए थे। इतवार का दिन होने से देवराज भी द्वार पर, अध्यापक के दिये हुए सवालों को लगा रहा था। उसकी माँ, राधा, घर का काम खतम करके चटाई पर बैठी कपड़े सी रही थी।
पार्वती ने जिद करके माँ को गुड़िया सीने के लिये मजबूर किया। इसी समय सुचित सिंह आ गये। उन्होंने चार गज मलमल का कपड़ा सामने रख, चाची का पैर छूकर प्रणाम किया। राधा उठकर सुचित सिंह के बैठने का इंतिजाम करना चाहती थी, लेकिन सुचित सिंह देवराज की चटाई पर बैठकर बोले—“नहीं चाची, रहने दो। यहीं बैठता हूँ। चाची, यह कपड़ा तुम्हारे और देवराज के लिए है।”
“काहे तकलीफ किया, सुचित बबुआ? हम लोगों के पास देख नहीं रहे हो, कुर्ता-कुर्ती सब है।”
“हाँ, है तो। लेकिन चाची, हमारा भी तो कुछ धरम है।”
“अच्छा बबुआ तुम ही न हमारे हो। तुम न देखोगे तो कौन देखेगा?”
कुछ इधर-उधर की बातों के बाद चाची ने कहा—
“बबुआ सुचित, एक बात तुमसे कहनी थी, उस बार भी कहने का ख्याल था, लेकिन याद नहीं पड़ी। बेटा, देखो, वहाँ कलकत्ता में अपना ही न हाथ जलाते होगे? लछमिनियाँ को ले जाओ न? पकी-पकायी रोटी तो मिल जाया करेगी।”
लछमिनियाँ, सुचित की स्त्री, राधा के चचेरे भाई की लड़की थी। उसका ब्याह कराने में राधा का खास हाथ था। लछमिनियाँ का अपनी बुआ से बहुत प्रेम था और वह भी उसे पार्वती की तरह ही मानती थी। सुचित को इधर-उधर करते देख राधा ने फिर कहा—
“बहू को साथ रखने में क्या हरज है? बाहर जाने में लाज की बात क्या है? पति के साथ रहने में हरज! देखते नहीं, सूरज सिंह अपने बाल-बच्चों के साथ रहते हैं, छुट्टी में उनके साथ ही घर आते हैं और सबसे मिल-मिलाकर फिर चले जाते हैं।”
“सो तो ठीक। लेकिन चाची सूरज सिंह स्टेशन मास्टर हैं। चालीस रुपया और उससे दूनी ऊपर की आमदनी। रहने के लिए क्वार्टर। मुझे तेरह रुपया मिलता है। अकेले रहने के लिए तो घर मुफ्त है, लेकिन स्त्री को रखने के लिए किराये का मकान लेना पड़ेगा। पाँच-छै रुपये महीने तो उसी में लग जायेंगे। फिर, दो प्राणी का खाना कपड़ा!”
“तो बबुआ, तुम्हारी बात ही ठीक है। मुझे नहीं मालूम था। लेकिन, चारों भाई तो कलकत्ते में ही रहते हो। सबकी बहुएँ नहीं। अगर बड़ी बहू साथ रहे तो, खाने-पीने की तकलीफ नहीं होगी।”
“हाँ, चारों कलकत्ता में तो रहते हैं; लेकिन, कलकत्ता रामपुर की तरह छोटा-सा गाँव नहीं है। बड़े भैया ललुआ में, मझले भैया अलीपुर, मैं सियालदह में और छोटकन भैया और भी दूर बजबज में—चार-चार, पाँच-पाँच कोस पर हम लोग रहते हैं। एक बार के आने ही जाने में सारा दिन चला जायेगा।”
“स्त्री-जाति, मुझे क्या मालूम! लछमिनियाँ से मैंने कह दिया था कि अबकी जो सुचित बबुआ आवेंगे, तो तुझे साथ ले जाने को कहूँगी। वह ‘नहीं-नहीं’ कह रही थी, लेकिन जाती क्यों न।”
“सो तो जो कुछ तुम कहती, उससे कौन इन्कार करता? लेकिन चाची, यदि सूरज सिंह की तरह भी मैं रहता, तो भी तुम्हारी बहू को साथ न ले जाता। मझले भैया जमादार हैं, भौजी की भी बात चल जाती। मैं भी घूर-लँगोटा चढ़ाता हूँ; इसीलिए अफसर लोग खुश रहते हैं। उन लोगों की मेहरबानी है, जब कभी असामी (कैदी) वहाँ से इधर को भेजना होता है, तो मेरा ख्याल रखते हैं और इसी बहाने साल में दो बार जरूर एक-दो दिन घर रहने का मौका मिल जाता है।”
“सो तो देखती हूँ बाबू, तुम्हारे मझले भैया को दो-दो, तीन-तीन बरस हो जाते हैं घर आए।”
“कैदी ले आने का तो काम बहुत जोखिम का है। चाची, बड़े भारी-भारी चोर होते हैं। रेल से कूदकर यदि कोई कैदी भाग गया, या शहर ही में चकमा देकर चला गया, तो सिपाही राम को ही सरकार जेल भेजती है। हमारे जान-पहिचानियों में से दो इसी कसूर में जेल भेजे जा चुके हैं, नौकरी तो उनकी गई ही। चोर ने कह दिया—‘बाबू, पास ही में घर है, एक साँझ के लिए ले चलें। पाँच सौ रुपया देंगे।’ लालच के मारे सिपाही ले गये। हथकड़ी खोलकर घर में जाने दिया और बैठे दरवाजा अगोर रहे हैं। पूछते हैं तो मालूम होता है कि घर में कोई नहीं। एक चोर ने कहा—‘सिपाही जी, गंगा जी में थोड़े ही पानी में एक घड़ा रुपया और अशर्फी, चोरी का मैंने छिपा रक्खा है। बरसात के बाद फिर उसका पता नहीं लगेगा, किसी के काम नहीं आवेगा। थोड़ी देर के लिये वहाँ ले चलें तो घड़ा निकाल कर मैं आपके सुपुर्द कर दूँ। दया-धरम का ख्याल हो तो कुछ मेरे बाल-बच्चों को दे देना, नहीं तो व्यर्थ बरबाद होने से आपके काम आ जाये तो वह भी अच्छा।’ मूर्ख सिपाही धन के लोभ में चोर को वहाँ ले गये। हथकड़ी खोलकर जहाँ उसे पानी में जाने का मौका मिला कि दो डुबकियों में वह धार के बीच में पहुँच गया। सिपाही लोग मुँह ताकते रह गये। पीछे हरेक को दो-दो साल की सजा। देखा न चाची कितना जोखिम का काम है?”
“हाँ बाबू, सुनकर मेरा तो रोआँ खड़ा हो गया। मन तो कहता है कि कह दूँ, ऐसा जोखिम मत उठाओ। लेकिन फिर तो मुझे और लछमिनियाँ को साल में दो बार तुम्हारा मुँह देखने का मौका नहीं मिलेगा।”
कुछ इधर-उधर की बात होने के बाद दूसरे भाइयों की चर्चा चली। सुचित सिंह ने कहा—
“सुक्खू भैया तो देवता हैं, चाची हमारे घर के सरदार हैं। और, लक्ष्मी उन्हीं के भाग्य से है। मैं, और दोनों भाई भी, चार-पाँच रुपया काटकर बाकी सब तनखाह और ऊपर की आमदनी हर महीने सुक्खू भैया के हाथ में दे आते हैं। पाँच साल हो गया; उस वक्त मुझे ग्यारह रुपये मिलते थे। पाँच रुपये खर्च के लिए रख कर छै रुपये मैंने उनके सामने रक्खे। उन्होंने दो रुपये मेरे हाथ में रखकर बड़ी करुणा के साथ कहा—‘बबुआ, इसे ले जाओ। तुम अखाड़ा में लड़ते हो। घी नहीं खाओगे तो जोर करते नहीं बनेगा।’ मेरे आनाकानी करने पर बोले—‘बबुआ सुचित, मैं जानता हूँ कि कैसे पेट काट-काटकर हमारे भाई रुपया देते हैं। परिवार का बोझ, माँ, चार स्त्रियां और सात-आठ बच्चे। सबका खाना और इज्जत ढाँकना। रुपया लिये बिना काम नहीं चल सकता। लेकिन, क्या मेरी आँखें नहीं हैं। हमारे शेर के से तीनों भाई। अच्छी तरह खाने और कसरत करने का मौका मिलता तो सारे कलकत्ता में कितने माँ के लाल हैं, जो उनकी पीठ में धूल लगा पाते। मैं जानता हूँ, सोने के शरीर को माटी करके यह रुपया मुझे मिलता है। बाप के मरने पर बड़ा भाई उसकी जगह होता है। मैं बड़ा भाई हूँ और अपना धरम समझता हूँ। भूख और गरीबी से क्षुब्ध हो अट्ठारह बरस की उम्र में मैं कलकत्ता भाग आया और उसी उम्र में पहुँचते-पहुँचते तुम लोगों को भी लाकर भाड़ में झोंकना पड़ा। कलकत्ता का पानी, कितना कमजोर! मैं तो तमाम जिंदगी पैटमैन रह गया। लेकिन, पढ़ने-लिखने वाले कितने सुख और इज्जत से रहते हैं—यह बात मुझसे छिपी नहीं है। मेरी बड़ी लालसा थी कि तुम पढ़ते। एक भाई न भी कमाता तो भी हम उसके लिये तैयार थे। लेकिन, तुम्हारी रुचि न देखकर—और कुछ अपनी गरीबी का भी ख्याल करके पाँच रुपये के लालच से तुम्हें भरती करा दिया। अब घर में दस बीघा खेत हो गया है। पन्द्रह रुपया महीना चला जाये, तो घर का काम निबह जायेगा। बबुआ सुचित, हम तीन भाई हैं। तुम घर की फिक्र मत करो। खूब देह बनाओ। उस दिन पंजाबी पहलवान को तुमने पछाड़ा था, उसे सुनकर मेरी गज भर की छाती हो गई थी। मुझे लज्जा है कि जितना तुम्हारे लिये करना चाहिए, उतना मैंने नहीं किया....’
भैया की आँख डबडबा आई।
“चाची, सुक्खू भैया देवता हैं।”
“ठीक कहा बाबू, सुक्खू भैया जैसा भाई, राम करें, सबको मिले। घर में अपने-पराये का उनको कुछ ख्याल नहीं। बड़ी बहू ने पहले एकाध बार कहा भी—‘किसके लिए मर रहे हो, तुम्हारे न लड़का है, न लड़की। घर भर के लिये कितने दिन तक कलकत्ता में सत्ती होगे?’ तो सुक्खू भैया ने ऐसा जवाब दिया कि बहू का तबसे फिर मुँह नहीं खुला। कहा—‘चुप रह डाइन, ये किसके लड़के हैं? क्या हम चारों भाई एक माँ की कोख से नहीं निकले हैं? क्या हमने उसी माँ का दूध नहीं पिया? लड़का-लड़की से क्या सहोदर भाई कम है? और लड़के-लड़की ही कितनों को जग जिता देते हैं? कितने माँ-बाप तो बुढ़ापे में उनके नाम पर रोते हैं। मेरे भाइयों जैसे भाई तूने कहीं देखे हैं? मुँह खोलकर जवाब देने की तो बात क्या, कभी किसी ने मेरी बात को भी नहीं टाला? मेरे कहने पर वे हाथ बाँधे चौबीसों घण्टा तैयार रहते हैं। मेरे भाई ऐसे हैं, जहाँ मालूम हुआ कि भैया का सिर दर्द कर रहा है, तीनों में जो जहाँ है, वह वहीं से आ पहुँचता है। फिर कभी ऐसी बात मुँह से न निकालना।’ और तबसे बहू ने कुछ नहीं कहा।”
“हाँ चाची, आजकल ऐसा भाई मिलना मुश्किल है। हम तीनों भाइयों ने कई बार कहा कि भौजी को बुला लो। क्वाटर मिला ही है। लेकिन कहते हैं—‘नहीं, बेवकूफ हो। यहाँ रखने से खरच बढ़ेगा। इतना ही नहीं, सिवाय रोटी पकाने के तुम्हारी भावज के लिए यहाँ कोई काम भी तो नहीं रहेगा। वहाँ, गाँव में, उस पाँच रुपये का बड़ा मूल्य है जिसे कि हम यहाँ खर्च कर देंगे। गाँव में रहने पर घर का कामकाज, लड़कों की देखभाल—पचास काम हैं। मैं तो खुद पेंशन लेने वाला हूँ। रामप्रसाद जहाँ इण्ट्रेंस पास हुआ कि थानेदारी में भरती कराया। और, फिर यहाँ जिन्दगी भर थोड़े ही रहना है; रामपुर चलकर घर देखना है कि?’ चाची, अब उनकी यही धुन है कि रामप्रसाद को दारोगा बनवाकर गाँव चले आवें। रामप्रसाद घर का बड़ा लड़का है। उसके लिए वह जान देते हैं। रामप्रसाद क्या जानता है कि मझले भैया उसके बाप हैं?”
राधा और सुचित को बात-ही-बात में शाम होने का पता नहीं चला। देवराज भी हिसाब लगाना भूल गया। अबेर होते देख सुचित सिंह ने खुद बिदाई माँगी।