जीने के लिए Ch. 3

अनाथ लड़का

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 06:45 AM

३

अनाथ लड़का

क्वार का अँधेरा पक्ष था। वर्षा हफ्ते से रुकी हुई थी। लेकिन, रामपुर के ताल, पोखरे भरे हुए थे। मक्का कट चुका था और खेतों में बँधे मचान सूने पड़ गये थे। अबकी साल रामपुर में सभी फसल अच्छी रही। धान तो और भी अच्छा। लोग कह रहे थे—बारह साल के बाद ऐसा धान आया है। आसमान बिलकुल साफ था और तारे दुगुनी जोत से चमक रहे थे। बाग के दरख्तों की सूरत में छिपा अन्धकार, काली स्याही पुती-सी मालूम होती थी। वृक्षों पर नीचे से ऊपर तक लाखों जुगनू चमक रहे थे। बस्ती में चारों ओर सन्नाटा था। लेकिन बाहर की ओर, जब-तब उल्लू की आवाज सुनाई देती और बड़ी भयावनी मालूम होती थी।

लौटू सिंह का घर गाँव के छोर पर था। दो कोठरियाँ, सामने फूस का ओसारा और बाहर खुला आँगन। ओसारे की एक तरफ बकरियाँ बाँधी जाती थीं। गर्मियों में लोग बाहर सोते थे, बरसात में ओसारे में, जाड़ों में घर के भीतर। एक कोठरी में सामान रक्खा रहता था और दूसरी में चूल्हा, जाड़ों में सोने का भी इन्तिजाम उसी में रहता।

पहर भर रात रह गई थी, अब भी लौटू सिंह के घर की एक कोठरी से दिये की धीमी रोशनी दिखलाई पड़ रही थी। भीतर जमीन पर एक तरफ दो लड़के पुआल पर लेटे हुए थे। दूसरी तरफ चारपाई पर राधा पड़ी थी। उसके कंठ से ‘घर-घर’ की आवाज आ रही थी, और लौटू सिंह बड़े शंकित हृदय से गौखे पर रक्खे दीपक के क्षीण प्रकाश से उसके मुँह की ओर देख रहे थे। राधा के खून से भरे सुन्दर-गोरे उस हँसमुख चेहरे का कहीं पता न था। उसके गाल भीतर धँस गये थे और आँखें कुएँ में डूबी-सी मालूम पड़ती थीं। उसके पतले ओठ सूख गये थे और चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ रही थीं। उसके सिर के काले केश बहुत कम बच रहे थे। राधा असाढ़ से ही बीमार पड़ी थी—बुखार आने लगा था; लेकिन, कितने दिनों तक लौटू सिंह को उसने इसका पता भी नहीं लगने दिया। शरीर को गरम देखकर जब कभी लौटू सिंह ने पूछा तो कह दिया कि जरंस है। शरीर में शक्ति कायम रखने के लिए वह जबर्दस्ती कुछ खा लिया करती थी। राधा ने घर का काम-काज तब तक नहीं छोड़ा, जब तक बीमारी ने उसे चारपाई पर पटक नहीं दिया।

वैद्य ने बतलाया कि पाण्डुरोग है और लौटू सिंह ने अपनी सारी शक्ति राधा की चिकित्सा में लगाई। दस-बारह मील के भीतर कोई अस्पताल न था और दूर के सरकारी अस्पताल में राधा की भरती हो जाती, इसमें भी संदेह था; क्योंकि लौटू सिंह को किसी प्रभावशाली पुरुष की न सिफारिश मिलती और न उसके पास उतना रुपये का ही बल था। लेकिन, दो-चार कोस के भीतर जितने भी वैद्य-हकीम थे, सबके ही दरवाजों की उन्होंने खाक छान डाली। सिलाई और बकरी से राधा ने जितने रुपये जमा किये थे, सब खर्च हो गये। बकरियाँ भी बिक गईं। दस-दस, बीस-बीस करके लौटू सिंह ने डेढ़ सौ रुपये साहू से उधार ले लिये। साहू ने नौकर जानकर बड़ी मेहरबानी की थी और उनके दो एकड़ खेत को मकफूल रखकर रुपया सैकड़े पर कर्ज दिया था। लौटू सिंह खूब समझते थे कि वह कैसी आर्थिक कठिनाइयों में अपने को डाल रहे हैं, लेकिन वह अपने शरीर और बच्चों को बेचकर भी स्त्री की प्राणभिक्षा पाने के लिए तैयार थे। महीनों राधा जीवन और मरण के बीच झूलती रही। वैद्य निराश हो रहे थे। ज्योतिषियों ने भी कुंडली देखकर बतला दिया कि साढ़े साती शनिचर का कोप है, बचना संभव नहीं।

लौटू सिंह का ओझों और सयानों पर विश्वास था। यद्यपि सभी सयाने सभी बातों में एक राय नहीं रखते थे। कोई कहता—ब्रह्म-पिशाच लगा है, कोई कहता—जिन, कोई कहता—मुड़कटा और कोई तेलिया-मसान—किन्तु यह मानने को सभी राजी थे कि कारण बहुत जबर्दस्त है; लौंग, भभूत कुछ नहीं सुनता। राधा गाँव की एक अनपढ़ स्त्री थी; लेकिन, तो भी इन बातों पर उसका उतना विश्वास न था। कितने ही दिनों तक वह बेहोश रही और किसी को उसके जीवन की आशा नहीं रह गई थी। लौटू सिंह बच्चों के भय से खुलकर रोते न थे; लेकिन, उनकी आँखें अक्सर डबडबायी रहती थीं। पार्वती अपने चचेरे भाई के लड़कों के साथ खेलती थी। लछमिनियाँ उस पर बहुत ध्यान रखती थी।

देवराज अभी दस साल का बच्चा था। लेकिन गरीबी के कारण दुनिया के भले-बुरे थपेड़ों को सहने का मौका उसे मिला था, जिन्होंने उसे अधिक चिंतनशील बना दिया था। माँ की बीमारी की गंभीरता उससे छिपी न थी, चाहे उससे छिपाने की कितनी ही कोशिश की जाती रही। वह खयाल करता था—माँ मर जायगी, तो इस घर का, बाबू का, पार्वती का और मेरा क्या होगा? स्कूल और गाँव के लोगों की भर्त्सनाओं—जिनका कि कारण दरिद्रता और जरूरत से अधिक आत्मसम्मान होता—को सुनने के बाद जब उसका कलेजा विह्वल हो जाता, तो माँ की गोद ही थी, जिसमें एक क्षण बैठकर वह सब कुछ भुला देता। उसका मन माँ के एक-एक काम की ओर घूमने लगता था। सोये देवराज को माँ सबेरे कहती—“बेटा देवराज, उठो, पाठशाला जाओ, मुँह धोलो, कलेऊ करके चले जाओ।” धूप में आने से मुँह को सूखा देख, वह व्यग्र हो जाती, और देवराज के मुँह को आँचल से पोंछती हुई कितने ही प्रश्न कर डालती। देवराज का मुँह, आँख, नाक ठीक वैसी ही थी जैसी कि राधा की। रंग भी गोरा और बाल तो करीब-करीब भूरे। देवराज सोचते-सोचते चिंता में डूबकर इतना कातर हो जाता कि उसका मन उसे यह कहकर समझाना चाहता—नहीं, सब झूठ है, माँ मरेगी नहीं।

इधर एक सप्ताह से राधा की अवस्था सुधर चली थी। उसे हल्का-सा पथ्य भी दिया जाने लगा था, और अब वह मृत्यु के पंजे से बाहर थी। आज, इस रात को ‘घर-घर’ की आवाज सुनकर लौटू सिंह उठ पड़े और साथ ही उनकी चिंता भी बड़े वेग से जग पड़ी। वह दिया बालकर बड़ी गंभीरता से राधा का मुँह देख रहे थे। उनके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उत्पन्न हो रही थीं—बीमारी का सुधार कहीं दिखावटी तो नहीं है, अक्सर ऐसे सुधार धोखा देने के लिए होते हैं। ‘घर-घर’ की आवाज उन्हें और भी चिंताकुल कर रही थी। लेकिन वह देख रहे थे कि राधा गंभीर निद्रा में उतान सो रही है। लौटू सिंह ने और नजदीक से देखने के लिए चिराग उठाया। उसकी रोशनी या पैर की आवाज के कारण राधा की नींद टूट गई। आँख खोलकर देखा तो पास में लौटू सिंह का चेहरा और चिराग था। निर्बलता के कारण बड़े क्षीण स्वर में उसने कहा—

“तुम जाग रहे हो, सोए नहीं? मैं तो खूब सो गई थी। चिराग से क्या देख रहे हो?”

“नहीं, ऐसे ही देख रहा था। तुम्हारे कंठ से ‘घर-घर’ की आवाज आ रही थी।”

“कुछ नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूँ। अब खाली कमजोरी है। मैंने कितनी बार कहा कि तुम अपने खाने-सोने की ओर ध्यान रक्खो। महीनों हो गये रात-रात जागते! क्वार का महीना है, जर-जूड़ी तो ऐसे ही आ जाती है। जो तुम भी बीमार पड़ गये तो घर का क्या होगा? बच्चों का क्या होगा? चार महीने की बीमारी के बाद शरीर में शक्ति आने में कुछ समय जरूर लगेगा; लेकिन, मुझे मालूम है, बीमारी चली गई। हाथ जोड़ती हूँ, तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ; मेरे लिए और दोनों नन्हे बच्चों के लिए तुम अपने शरीर पर दया करो।”

राधा की धीमी आवाज में निर्बलता थी, और इतनी बात करने में उसे कितनी ही बार सुस्ताना पड़ा; लेकिन, उससे एक बात स्पष्ट थी—अब वह प्रकृतिस्थ है।

लौटू सिंह जाकर सो रहे।

× × ×

राधा की बात ठीक निकली। अतिजागरण और खाने-पीने की लापरवाही के कारण लौटू सिंह का शरीर बहुत दुर्बल हो ही गया था। क्वार के उतरते-उतरते उन्हें जूड़ी आने लगी। राधा ने अभी-अभी चारपाई छोड़ी थी, अभी वह कोई काम करने लायक न थी। दीवाली आई, लेकिन लौटू सिंह को जूड़ी ने न छोड़ा। उस वक्त माँ-बाप के पथ्य और दूसरे काम का भार अधिकतर देवराज के ऊपर था। सुचित सिंह की स्त्री भी उसे मदद देती थी और चचेरे भाइयों का परिवार भी खयाल रखता था। दीवाली के बाद तिजारी होकर जूड़ी जारी रही। राधा जितनी तेजी से बल प्राप्त नहीं कर रही थी, उससे अधिक तेजी से लौटू सिंह कमजोर होते जा रहे थे। भोजन उन्हें रुचता न था और पेट की तिल्ली बढ़ रही थी। धीरे-धीरे अवस्था भयानक रूप धारण करने लगी। कार्तिक की पूर्णिमासी तक यद्यपि राधा का शरीर बहुत कुछ पूर्ववत् हो गया था—हाँ, उसके बाल सब गिर गये थे—लेकिन अब लौटू सिंह ने चारपाई पकड़ ली।

भाई-बंदों ने कार्तिक में खेत तो किसी तरह बोझा दिया, लेकिन दवा-दारू और घर का खर्च एक बड़ी समस्या थी। न लौटू सिंह की तनख्वाह और ऊपर की आमदनी का सहारा था और न राधा की बकरियाँ और उसकी सुई ही काम दे रही थीं। अपने प्यादे के लिए, और उससे भी ज्यादा, दो एकड़ खेतों के लिए साहू ने डेढ़ सौ रुपये कर्ज दे दिये थे। अब वह एक रुपया भी अधिक देने को तैयार न थे। बहुत कहने-सुनने और गिड़गिड़ाने पर उन्होंने पच्चीस रुपया और दिया।

दवा-दारू का कोई असर न हुआ। बीमारी बढ़ती ही गई और अगहन के मध्य तक लौटू सिंह चल बसे। पति की बीमारी में लगी होने के कारण राधा को सीने-पिरोने का मौका कहाँ था? अब सवाल था श्राद्ध और क्रिया-कर्म का। इसके लिए रुपया कहाँ से आये? यह मामूली प्रश्न नहीं था। राधा ने अपने बचे-खुचे जेवरों को गिरवीं रखकर उधार-बाढ़ करके पति का श्राद्ध किया।

राधा के लिए संसार सूना था। यहाँ प्रेमिक और प्रेमिका के भावुकतापूर्ण हृदयों के बिछोह मात्र की बात न थी, सबसे बड़ा प्रश्न था आश्रयविहीन होना। दोनों की बीमारी और श्राद्ध में ढाई सौ रुपये कर्ज हो गये, और ढाई रुपया महीना सूद बढ़ रहा था। उस पर राधा को अपने और दो बच्चों का पेट चलाना था। घर में एक अच्छत भी अनाज न था और सुई-धागा छोड़कर राधा के पास जीवन-यात्रा का कोई सम्बल नहीं रह गया था। राधा का दिल भारी बोझ से दबा हुआ था। जीविका के लिए वह अपनी सिलाई पर भरोसा कर सकती थी लेकिन, जब वह ढाई रुपये महीने सूद और अपने खेत का खयाल करती, तो उसके सिर में चक्कर आने लगता। उसको चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा नजर आता।

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