अन्तिम आकांक्षा Ch. 2

अध्याय 2

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 08:28 AM

इधर-उधर घूम फिर कर, सन्ध्या के उपरान्त नित्य की भाँति जब मैं घर लौटा तब, मुन्नी रामलाल के सामने बैठी बड़े ध्यान से कुछ सुन रही थी । मुझे देखते ही उल्लास के साथ बोल उठी- भैया, बड़ी अच्छी कहानी है; तुम भी सुन लो ।

मैंने रामलाल से पूछा- तुझे कहानी कह आती है ?

उसने विनय का आडम्बर किये बिना, निस्संकोच कहा- हाँ हाँ भैया, मैं ऐसी कहानियाँ कह सकता हूँ, जो रात रात भर पूरी न हों।

मुन्नी कहने लगी- बैठ जाओ भैया, सुन लो । राजा ने अपने दो राजकुमारों को देश निकाला दे दिया था। रात में पहरे पर जागते हुए भूखे छोटे कुँवर से पेड़ के पंछी ने आदमी की बोली में - हाँ क्या कहा, रामलाल ?

रामलाल कहने लगा-सुनसान अँधेरी रात; चारों ओर बियाबान जङ्गल । ऐसे में पेड़ के पंछी ने आदमी की बोली में साफ कहा- सुन, ऐ राजकुमार !

"सब झूठ" कह कर मैं आगे बढ़ने लगा; परन्तु रामलाल के अभिनयोचित कथन ने मेरे हृदय और कान अपनी ओर आकृष्ट कर लिये। मुन्नी कहने लगी- वाह झूठ कैसे ! रामलाल ने साधू-महात्मा के मुँह से सुनी है, उनकी धूनी दिन रात कभी ठंडी नहीं होती; पूरा माथा भर कर तिलक लगाते हैं। क्यों रामलाल ?

उसने संक्षेप में कहा – हाँ ।

मुझे जान पड़ा कि वक्ता और श्रोता के इस आमन्त्रण को ठुकरा कर मैंने ठीक नहीं किया। नहीं तो, उस कहानी का कहने वाला क्या अकेला रामलाल ही था? नहीं, उसके भीतर से अनन्त काल की गाथा अपने आप बोल रही थी; न जाने कितने युगों से उसका वह अविरुद्ध स्रोत निरन्तर बहता चला आ रहा था, न जाने कितने शिशुओं के हर्षोच्छ्वास से फिर फिर ओतप्रोत होकर, न जानें वह कितना आगे बढ़ जाना चाहता था ! असत्य और अनैसर्गिक कहकर उसकी गति वहीं रोक दी जाती, क्या यह सम्भव था ? - नहीं, मैं आगे न बढ़ सका। लौट कर मुन्नी के पास बैठ गया और उसकी पीठ थपथपा कर उसे दोनों हाथों से हिलाने लगा उसके हृदय के श्रोता का आनन्द मानों इतनी ही बात से दुगुना हो गया। बोली- झूठ नहीं भैया, रामलाल ने बहुत बड़े साधू-महात्मा के मुँह से सुनी है। उनकी धूनी रात-दिन-

मैंने कहा- दुत् ! साधू-महात्मा कह बैठे कि मेरी पूजा में किसी मुन्नी की बलि चाहिए तो क्या तू इसे भी मान लेगी ?

उसने अपना सिर दूसरी ओर फेर कर कहा -जाओ, मैं तुम्हारी बात नहीं सुनती।

रामलाल को कहानी कहने के लिए प्रस्तुत देख कर मैंने कहा- तुम्हारी यह कहानी रात भर वाली तो नहीं है ?

वह बोला- नहीं भैया, बहुत छोटी है । परन्तु तुम कहो तो दूसरी सुनाऊँ । दानव और उसकी कन्या की दानव ने नगर का नगर उजाड़ कर दिया था। बहुत अच्छी । जो एक बार सुन लेते हैं, बार-बार सुनना चाहते हैं।

विज्ञ श्रोता को सामने पाकर रामलाल एक अख्यात साहित्यिक की तरह अपनी सर्वोत्तम वस्तु सुनाने के लिये बुरी तरह व्याकुल हो उठा। परन्तु बीच में ही टोक कर मुन्नी ने कहा- नहीं भैया, यही होने दो। हाँ, रामलाल, सुनसान अँधेरी रात में पेड़ के पंछी ने आदमी की बोली में कहा; - हाँ, क्या कहा?

उत्सुकता मेरी जाग गई थी, फिर भी मुझे अपने बड़प्पन का ध्यान रखना आवश्यक था। मैंने मुन्नी से कहा- देख, कहानी के बीच में 'हूँ' तुझे ही करनी पड़ेगी।

रामलाल की वाग्धारा इन साधारण बातों से रुकने की न थी। अपने पूर्व वेग से वह फिर प्रवाहित होने लगी। बाल साहित्य की अनेक कहानियाँ मैं पहले पढ़ चुका था; इधर-उधर सुनी भी बहुत-सी थीं। परन्तु इसके कथन में तो कुछ दूसरी ही बात है। मेरे लिये इस तरह की जो कहानी अपनी षोड़शावस्था पार करके कभी की जरा-जर्जर हो चुकी थी, रत्नाभूषण पहना कर इसने मानों फिर से उसे पूर्वावस्था में लाकर मेरे सामने खड़ा कर दिया। माँ के पद- शब्द से सहसा मेरा ध्यान टूटा | झट से कुछ आगे झुकते हुए, रामलाल के मुँह पर अपना एक हाथ रख कर मैंने कहा - चुप !

मुन्नी एकदम चौंक पड़ी। मैंने कहा- देख रामलाल, माँ सुन रही हैं। तू मेरा नौकर है; खबरदार जो इन्हें कुछ सुनने दिया। क्यों मुन्नी, कैसी कहानी है ? आज तक ऐसी कभी किसी ने न सुनी होगी। है न ठीक ?

प्रशंसा बहुत कुछ खाई जाने वाली तमाखू के समान है, जो अपना नशा पेट के भीतर पहुँचे बिना ही देने लगती है। कहानी के संबंध में मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसका उद्देश्य शुद्ध प्रशंसा न होकर कुछ और है, यह बात रामलाल निश्चय ही जानता था। फिर भी मैंने देखा, एकाएक वह पुलकित हो उठा है। बोला- हाँ मा, बड़ी अच्छी कहानी है । परन्तु दूसरी इससे भी अच्छी है। तुम सुनो तो वैसी ही रह जाओ ।

मैंने रोष दिखा कर देख फिर वही बात मैं कह चुका हूँ,- खबरदार जो माँ को कुछ सुनने दिया।

माँ ने भीतर की ओर लौटते हुए कहा-चल, चल, रहने दे अपनी कहानी; मैंने भी बहुत सुनी हैं।

रामलाल ने मुन्नी को हाथ से ठेलते हुए दबे स्वर में कहा- जा बिन्नी जा, माँ को लौटा तो ला ।

मुन्नी दौड़ कर माँ से लिपट गई। उन्हें अपनी ओर खींचती हुई अनुनय के स्वर में बोली- आओ माँ, तनिक तुम भी सुन लो पेड़ के पंछी ने आदमी की बोली में बात की थी। रामलाल ने बहुत बड़े साधू- महात्मा के मुँह से सुनी है।

साधू-महात्मा की धूनी और उनके तिलक छापों की बात सुने बिना ही माँ को अविश्वास का कोई कारण न दीखा। लौट कर हँसती हुई बोलीं- तेरे भैया तो सुनने ही नहीं देते। सबेरे उन्होंने रामलाल को खिला-पिला नहीं पाया। तभी से नाराज हैं।

मुन्नी बोली- हाँ माँ, रामलाल को यहीं ब्यालू करा दो। घर जा रहे थे, तब तक मैंने कहानी कहने के लिये रोक दिया। - सुनती हो माँ?

माँ ने उत्तर दिया- परन्तु तेरी कहानी पूरी हो तब तो ।

रामलाल को ब्यालू का यह प्रसंग अच्छा न लगा। उसकी कहानी का पुरस्कार इससे बढ़ कर और क्या हो सकता था कि ऐसे-ऐसे श्रोता उसके सामने थे। उसने संकोच के भाव से कहा- नहीं, मुझे कुछ देर नहीं हुई। मैं घर जाकर ही-

बीच में ही आज्ञा-सूचक कठोर स्वर से मैंने कहा- नहीं, ब्यालू तुझे यहीं करनी पड़ेगी ।

रामलाल हलकी हँसी हँसकर फिर कहानी कहने लगा ।

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