अन्तिम आकांक्षा Ch. 3

अध्याय 3

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 08:28 AM

दो-चार दिन में रामलाल मुझसे हिल मिल गया। उसका व्यवहार उन दूसरे नौकरों जैसा न था, जिन्हें मेरे काम के लिए अवकाश के समय में भी कभी अवकाश न मिलता था। अपने आप आ आकर वह मेरी आवश्यकताएँ जानने का प्रयत्न करता था। पतंग की डोर पर माँजा चढ़ाने के लिये मुझे काँच के महीन चूरे की आवश्यकता पड़ती। दूसरे नौकरों की आनाकानी के कारण एक दिन मैं स्वयं काँच पीसने बैठ गया। इसके लिए मेरे ऊपर डाँट पड़ी। वास्तव में यह डाँट पड़नी चाहिए थी नौकरों पर, जो उस समय तमाखू जैसा बहुमूल्य पदार्थ जला जला कर राख कर रहे थे। रामलाल के कारण मेरी यह कठिनाई सहज ही दूर हो गई। वह मेरा समवयस्क ही था, परन्तु काँच पीसते हुए उसको कोई नुकीला कण चुभ जाने का डर किसी को न था । - इसलिए अब जब मैं चाहता तभी मेरी डोर पर माँजे का कवच चढ़ जाता। दूसरे की कटी हुई पतंग लूटना भी मेरे लिए निषिद्ध था । मेरे सामने से ही किसी की कटी हुई पतंग निकल जाय और दो ही पग दौड़कर मैं उसके ऊपर अपना आधिपत्य न जमा सकूँ, इस बात से मेरे किशोर मन को कितनी पीड़ा होती, इसे दूसरा कोई अकालवृद्ध क्या जानें। लूटी हुई इस पतंग में मेरे लिए विजय - गर्व का जो आकर्षण था, बाजार से खरीद कर लाई गई सौ पतंगों में भी वह कहा। लूट-पाट के इस काम में रामलाल जैसा उत्साह दिखाया करता, उससे मेरे खेल का आनन्द सौगुना बढ़ जाता। एक दिन रंग-बिरंगी पतंग लूटने के लिए ऊपर के एक छज्जे पर वह बिल्ली की तरह चढ़ गया। वहाँ से जरा भी चूकता तो नीचे गिरकर उसकी हड्डी पसली चूर-चूर हो जाती। परन्तु जब सकुशल नीचे उतर कर उसने वह पतंग मेरे हाथ में दी, तब नौकर और स्वामी का भावभूल कर अपने उस विजयी सेनापति से मैं एकदम लिपट गया।

परन्तु रामलाल था 'नीच जाति' अर्थात्, वह हमारे यहाँ रोटी खा सकता था; हमारे जूठे बर्तन उठाकर माँज सकता था। और भी इसी तरह के अनेक काम थे, जिनसे अपने किसी पूर्वज का सिर नीचा होने का डर उसे न था। अतएव उसके साथ मेरी यह घनिष्ठता मुनीम कक्का को बहुत खटकती। वे मेरे पिता के निजी आदमियों में से थे और दीर्घ काल तक सुख-दुख के अभिन्न साथी रह कर हमारे परिवार के एक अंग ही बन गये थे। छुटपन में बहुत समय तक मैं यह अनुभव भी न कर सका था कि वे हमारे वेतन ****ी हैं। घर में मुझे किसी का डर था तो उन्हीं का । याद नहीं आता कि उन्होंने कभी मुझे मारा-पीटा हो, परन्तु मेरा विश्वास है कि यदि किसी नये यन्त्र की सहायता से उन दिनों मेरे मन का निरीक्षण किया जाता तो उस पर उनकी झिड़कियों की चोट के कई नीले चिह्न उभरे दिखाई देते ।

कक्का रामलाल से संतुष्ट न थे, यह मुझसे छिपा न था। कोई नौकर अपना निर्दिष्ट काम पूरा करके भी खेल-कूद का समय निकाल ले, यह जैसे उन्हें सह्य न था। वह पूरा काम नहीं करता, इस बात का प्रमाण क्या यह कुछ कम था कि वह मेरे साथ खेल-कूद भी लेता है। सम्भव है, उनके इस असन्तोष ने रामलाल को और भी मेरे निकट ला दिया हो। इसलिए उन दिन मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई, जब एक दिन दस रुपये का एक नोट लाकर मुझे बताते हुये उसने कहा- कक्का की गद्दी पर पड़ा मिला।

कक्का की गद्दी पर! एकदम आनन्द से उछल कर मैंने नोट उसके हाथ से छीन लिया। अब कहें, दूसरों पर तो तनिक तनिक सी बात पर बिगड़ते हैं और स्वयं दस दस रुपये के नोट इस तरह गिरा देते हैं। परन्तु हाय ! मुझमें ऐसी शक्ति न थी कि ऐसी भूल के लिए भी उनसे कुछ कह - सुन सकूँ ।

उनके सामने मैं अपनी उपस्थिति सदैव अपराधी के रूप में ही पाता था। इसलिए उनके नोट गिरा देने की यह घटना मुझे बहुत महत्वपूर्ण जान पड़ी। मेरे लिये यह एक ऐसी विजय थी, जिसका आनन्द दुहरा था। विजय रामलाल के ऊपर छापा मार कर अपने बल से मैंने इसे हस्तगत किया था।

परन्तु मेरा यह आनन्द तभी तक था, जब तक मैं कक्का के सामने न था। मेरे हाथ में नोट देख कर मेरे कुछ कहने के पहले ही वे बोल उठे - गद्दी पर से यह नोट क्यों उठाया?

उस कठोर स्वर से मैं एकदम गड़बड़ा गया । तुरन्त उत्तर न देने से सम्भव था, मेरे अज्ञात अपराध में और भी वृद्धि हो जाती, इसलिये अचानक शीघ्रता में कह बैठा-रामलाल लिये जा रहा था-

हाय, मेरे मुँह से यह क्या निकल गया! कक्का अब उस बेचारे को चोर समझ बैठें तो वह इस कलंक को धोयगा किस तरह? दस रुपये की निधि उसके लिये साधारण न थी । पाँच महीने के अविश्रान्त परिश्रम के रूप में ही वह इसे पा सकता था। सो भी ऋण के ब्याज की कमी के रूप में, प्रत्यक्ष इसी तरह नहीं ।

कक्का ने अपने सहज-कर्कश स्वर में मुझसे पूछा- उसने इसे गद्दी पर से उठाया क्यों? - मानों रामलाल मैं ही होऊँ। अब इस बात का मैं क्या उत्तर देता? देख कर भी यदि वहाँ से वह उसे न उठाता तो कौन कह सकता है, यह भी उसका एक अपराध न होता। उसकी स्थिति मानों कैंची के संयुक्त दो भागों के बीच में थी । ऊपर की धार से अपने को बचाता है तो नीचे की धार से नहीं बचता और नीचे की धार से अपने को बचाता है तो ऊपर की धार से नहीं बचता। फिर भी कक्का ने रामलाल की नियति के ऊपर कोई आक्रमण नहीं किया, मुझे बहुत जान पड़ा।

गिरे हुए नोट के मिल जाने पर भी उनकी चेष्टा में प्रसन्नता की कोई छाप न देख कर मुझे उस समय बहुत दिनों तक बड़ा विस्मय रहा था । इसके कई बरस बाद यह समझने की योग्यता मुझमें आ सकी कि वास्तव में उस नोट के पड़े रहने में उनकी कोई भूल न थी । जाना समझा ही वह वहाँ पड़ा रहा था। जान पड़ता है, इस घटना के बाद कक्का के व्यवहार में उसके प्रति निश्चय ही कुछ कोमलता आ गई थी; - छेनी चलाने वाला पत्थर पर पानी डालकर उसमें जिस प्रकार की अलक्ष्य कोमलता उत्पन्न कर देता है, कुछ कुछ उसी प्रकार की। इसी से उस समय उसे मैं समझ न सका था।

कक्का ने मुझे लौट जाते देख कर एकाएक कहा - आजकल तुम कुछ लिखते-पढ़ते भी हो या दिन भर खेल-कूद और ऊधम उपद्रव ही किया करते हो?

मैंने ठिठक कर कहा- पढ़ता तो हूँ ।

"क्या पढ़ते हो, – अङ्गरेजी ?"

“हाँ।”

“हाँ।”

"अच्छा देखें, क्या पढ़ते हो । बोलो अङ्गरेजी !"

मैं चक्कर में पड़ गया कि क्या अङ्गरेजी बोलूँ और कुछ बोलूँ भी तो कक्का उसे समझेंगे क्या । हतबुद्धि-सा जहाँ का तहाँ देख कर मुझे डाँटते हुए उन्होंने कहा- तुम समझते हो, यह बूढ़ा बेवकूफ अङ्गरेजी क्या समझेगा ? – परन्तु मैं इतने में ही समझ गया, तुम्हारी लियाकत क्या है । नीच जाति के लड़कों के साथ खेलने से इस तरह का बोदापन न आ गया तो क्या? इतने बड़े हो गये, परन्तु बात करने का शऊर भी न आया । उस दिन सक्सेना वकील के यहाँ एक अङ्गरेज आया, उसके साथ में उसका छः सात बरस का लड़का था। उसकी फर्राटे की अङ्गरेजी सुनकर वकील साहब भी चकरा गये और तुम अभी तक अङ्गरेजी में एक बात भी नहीं कर सकते। जाओ, कमरे में बैठकर, अच्छी तरह पढ़ो।

इच्छा हुई, जान लेकर एकदम यहाँ से भाग जाऊँ । परन्तु भागा हुआ समझ कर कहीं फिर से न पकड़ लिया जाऊँ, इसलिए धीरे-धीरे खिसक कर चुपचाप अपने कमरे में जा बैठा ।

प्रतिदिन की तरह उस दिन भी जब घूम-घाम कर सन्ध्या के बाद घर लौटा तो मुन्नी ने झट से मेरे पास आकर कहा- भैया, तुम कहाँ गये थे? – कक्का तुम्हें खोजते थे ।

मैं शंकित हो उठा। पूछा- क्यों क्या बात थी?

उसने कहा- उनके साथ कोई बाबू था। कहने लगे, बुलाओ हरी को; बाबू साहब के साथ अङ्गरेजी में बातचीत करेगा। बाबू से कहते थे, हरी पढ़ने में बहुत तेज है। खूब पढ़ा कर उसे डिपटी कलट्टर बनायेंगे ।

मेरी अनुपस्थिति में कक्का मेरे विषय में ऐसी बात कहते थे ! मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तैयार था जेल की आज्ञा सुनने के लिए और न्यायालय ने दे दिया नगद पुरस्कार। मैंने हँस कर कहा - हूँ, जाने दे बाबू को ! - तनिक रामलाल को तो बुला बिन्नी । उसकी कहानी सुनूँगा ।

मुन्नी ने म्लान-मन से कहा- कक्का ने रामलाल को खलिहान पर भेज दिया है। वहाँ वह नाज की चौकसी करेगा। किसान बड़े चोर हैं न । आँख बचाकर तुरन्त बोरे के बोरे उड़ा देते हैं - इसी से ।

मेरे घर में रामलाल की विश्वस्ता का यह पहला पुरस्कार था ।

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