सुखशर्वरी Ch. 2

द्वितीय परिच्छेद — कुटीर

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 01:30 PM

द्वितीय परिच्छेद

कुटीर ।

"अपवादादभीतस्य, समस्य गुणदोषयोः।

असद्वत्तेरहो वृत्तं, दुर्विभाव्यं विधेरपि ॥

(भारविः)

सन्ध्या होनेवाली थी और आकाश सघन-मसीमयी जलदमाला से ढका था। अभीतक प्रचण्ड वायु बहती थी, पर अब मेघमण्डल की एकता के सूत में बँधे देख भय से अपनी प्रचण्डता कम करने लगी। मेघमाला शत्रु को वश में करके हँसी, वही हँसी चंचला की छटा थी। मेघ के हास्य को देख कर प्रचण्ड वायु तिरस्कार के छल से गरज उठी, फिर हँसी थम्ही और तिरस्कार भी रुका। मेघमण्डल मानो अपना दोष स्मरण कर अनुतप्त हो रोने लगा, वही अश्रुबिन्दु प्रबल वारिधारा में परिणत होकर बरसने लगी। रोते रोते वायु की अवश्यता याद करके मेघगण बीच बीच में, हँसते भी थे और रह रह कर वज्रगंभीर गर्जन भी करते थे, समय भयङ्कर और दुर्गम था।

बिजली के आलोक में सामने एक सरपट मैदान दिखाई दिया । यह स्थान पूर्वोक्त श्मशान से दो कोस उत्तर की ओर था। प्रान्तर के एक ओर कल्लोलवाहिनी भागीरथी बहती थी। वहांके वृक्षों के पत्तों के ऊपर वर्षाविन्दु पड़ापड़ पड़ती थी। बराबर वृष्टि ने वृक्ष के वासी पक्षियों को बड़ा कष्ट दिया था, इससे वे कलरव कर रहे थे, किन्तु सभों का शब्द वृष्टि के वर्षाकर शब्द से मिल गया था। भला, नगारखाने में तूती की आवाज कभी सुनाई देती है!

सहसा उस प्रान्तर में, “आह ! कहीं पर ऐसी जगह नहीं मिलती, जहां आश्रय लूं!" इस प्रकार सकरुण आर्तनाद सुनाई देने लगा। यह भयंकर ध्वनि वृष्टि के तुमुल शब्द में नहीं लीन हुई, बरन बहुत दूर तक तैर गई । इस पर प्रान्तर की दूसरी ओर

से, " इधर आओ बेटा! " यह शब्द तीर की तरह छूटा हुआ आया। यह ध्वनि आश्रय चाहनेवाले के कानों में गई । उस समय पथिक चारोओर देखने लगा। विद्युत्प्रकाश में दिखाई दिया कि, 'पास ही वृक्षों की बारी से घिरे हुए एक कुटीर में से दीपक का थोड़ा थोड़ा उजाला आ रहा है। इसी प्रकाश को लक्ष्य कर के बड़े कष्ट से पथिक वहां पहुंचा, और प्रकाश के समीप पहुंच कर उसने देखा कि, 'एक सुन्दर कुटीर है ! उसके बाहर का भाग वृक्षों से घिरा हुआ है, और द्वार पर एक वृद्धा बैठी चर्खा कात रही है।'

वृद्धा ने पथिक को देखकर आह्लाद के संग कहा,-"बेटा! मेरी आवाज तुमने सुनी थी न । बैठो, बेटा ! बैठो।”

पथिक आश्रय पाकर हर्ष से बुढ़िया के पास बैठ गया, वृद्धा चरखा कातना बन्द करके पथिक के संग वार्तालाप में प्रवृत्त हुई !

वृद्धा,-"तुम्हारा घर कहां है, भाई ! और नाम क्या है ? "

पथिक,-"मेरा घर मिहरपुर है, और नाम मनसाराम है। "

वृद्धा,-"यह लम्बा-चौड़ा नाम गाम रहने दो ! मैं भैया-बच्चू कहकर पुकार लूँगी। भला, इस आंधी-पानी में कोई घर के बाहर निकलता है ? कहांसे आते हो? और अब तक कहां रहे? "

पथिक " हां आं आं" यह कहकर अपने मन में विचारने लगा,-"व्यर्थ अबतक इधर उधर भटकता था! जिसे खोजता था, उसने स्वयं ही पुकार लिया।"

वृद्धा,-"अच्छा बेटा ! तुम क्या मुसल्मान हौ ? कितने दिनों से फकीरी करते हो?"

पथिक,-"हां, ठीक-बीस वर्ष से।"

वृद्धा,-"अच्छा, रोज खाने भर भीख मिल जाती है ?"

पथिक.-"नहीं माई, इसका कोई ठिकाना नहीं है, 'सब दिन नाहीं बराबर जात'-किसी दिन ज्यादे मिलता है, किसी दिन कम।"

वृद्धा,-"आज कहां गए थे। और क्या मिला?"

पथिक,-"आज आनन्दपुर गए थे, पर कुछ विशेष नहीं मिला।"

इसी समय एक बालक कुटीर के भीतर से आकर बोला,"क्यों ! मां ! यह पानी कब खुलेगा रे ? "

हमलोगों का परिचित सुरेन्द्रकुमार है।

वृद्धा ने बालक को गोदी में लेकर कहा,-"हां! बेटा! पानी बरसने से क्या तुम्हें कुछ कष्ट होता है ?"

"अब पानी खुलेगा" यह कहकर फकीर ने वृद्धा से पूछा कि, "यह बालक किसका है ?"

वृद्धा ने हँसते हँसते कहा,-'अब यह मेरा बालक है।"

फकीर ने आग्रहपूर्वक पूछा,-"तुम्हारा “अब" शब्द सुनकर मेरा कुतूहल बढ़ गया !"

वृद्धा,-"तो सुनो, तुमसे सब बात कहती हूं-यह बालक सचमुच मेरा नहीं हैं, प्रायः पांच-चार दिन हुए कि प्रातःकाल के समय इसकी बहिन इसे संग लेकर रोती रोती आश्रय ढूँढ़ने के लिये यहाँ आई । मैंने उससे सब बातें पूछीं । सुनने से बड़ा दुःख हुआ। इसीलिये उसके दुःख से दुःखित होकर, यहीं आश्रय दिया । तबसे ये दोनों यहीं रहते और मुझे मां कहते हैं।"

पथिक,-"तुमने उससे क्या पूछा था ? "

वृद्धा,-"यही कि, 'बेटी तुम क्यों रोती हो' ?”

पथिक,-"उसने क्या कहा ?"

वृद्धा,-"हां भाई! आते आते मार्ग में उसके पिता का परलोक हुआ । अपना-पराया कोई न रहने से वह रोती थी।"

पथिक,-"हा! बड़े दुःख की बात है ! ये लोग कहांसे आते थे?"

वृद्धा,-वहीं से तो-ऐ-हां ठीक याद पड़ा, हरीपुर से ! तुम बेटा हरीपुर जानते हो ?"

पथिक,-"आंख से तो नहीं देखा है, किन्तु नाना की बूआ की चाची के मुख से सुना था। ये लोग क्यों आते थे ?"

वृद्धा,-वहीं के जमीदार के अत्याचार से।"

पथिक,-'कौन अत्याचार ?"

वृद्धा,-"देखो बेटा ! हरीपुर के जमीदार को लड़काबाला नहीं है, वह बलात् इसी बालक को दत्तक लिया चाहता है।"

पथिक,-"या अल्लाह ! हमलोगों का कहां ऐसा भाग है कि अपना बालक न होने से दूसरे का लड़का लेकर सुख उठावें ! हां इसके बाद ?"

वृद्धा,-"अनन्तर भयानक अत्याचार से घबड़ाकर रातोंरात

लड़का-लड़की को संग लेकर इसके बाप घर से भागे थे; पर मार्ग में आते आते उनकी मृत्यु हुई। ”

पथिक ने अपने मन में कहा,-"बस अब कहां जाता है ! वह मारा!!! " फिर प्रगट में बुढ़िया से बोला,-"हां ! ये लोग जाते कहां थे?"

वृद्धा,-'यह बात यह नहीं जानती। कदाचित् वे कोई मित्र के घर जाते थे । क्यों बेटा ! धनिकों को दूसरों पर दया नहीं आती?"

पथिक,-"यह बात क्योंकर कहूं, सदा से तो दुःख **** रहा हूं।"

वृद्धा,-"हां भाई ! ठीक ही तो है ! हम दरिद्रों के पास क्या धरा है ? तो भी दया-मया जानती हूं। किसीका बुरा नहीं चेतती; और देखो न ! उस बूढ़े विचारे का बालक देखकर जमीदार की आंख इसी पर गड़ गई !”

पथिक,-

तुम्हें खूब दया मया है ! भाग्यों से तुम्हारा आश्रय मिला, इसीसे प्राण बचे । अबतक मैं तुम्हारे इस चरखे की तरह घूम रहा था। अच्छा! अल्लाह के फजल से लड़का जीता रहेगा।"

वृद्धा,-"ठीक कहते हो, बेटा! ठीक है ! कुछ जंतर-मंतर दे सकते हो, जिसमें यह अच्छा रहे!"

पथिक,-"हाँ हां ! जब सबेरे जाऊंगा, तब तुम्हें कुछ दे जाऊंगा।"

वृद्धा ने संतुष्ट होकर पथिक को फल मूल आदि आहार देकर अतिथिसत्कार किया । पथिक भोजनों को आत्मसात करके सोचते विचारते सोगया।

अब जल वायु भी शान्त हुई थी । मण्डूकों की "टर्रकों टर्रकों" वाली कर्कश ध्वनि कानों में आने लगी और जल का "कल-कल" शब्द सुनाई देने लगा। धीरे धीरे वृष्टि थमी। अब शृगालों का कर्कश शब्द गगनस्पर्श करने लगा।

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