सुखशर्वरी Ch. 3

तृतीय परिच्छेद — भग्नगृह

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 01:30 PM

तृतीय परिच्छेद

भग्नगृह ।

"दैवे विमुखतां याते, न कोऽप्यस्ति सहायवान् ।

पिता माता तथा भार्या, भ्राता वाथ सहोदरः॥"

(व्यासः)

वृद्धा, अनाथिनी बालिका और बालक सुरेन्द्र उस ठण्डी और गम्भीर निशा में निद्रित थे । धीरे धीरे निशादेवी का राज्य लुप्त होगया । कुटीर के भीतर शीतल, मन्द, सुगन्ध, समीर जलकण लिये मृदु मृदु चालों से अनाथिनी बाला को आकर स्पर्श करने लगा । अभी हम इस दुःखिनी बाला को अनाथिनी ही कहेंगे। उसने उठकर जो देखा, उससे वह बहुत स्तम्भित और चिन्तित हुई ! उसने देखा कि, 'सुरेन्द्र नहीं है और पथिक का भी कुछ पता नहीं है!' विचारी बाला घबड़ा कर आर्तनाद करने लगी। उसके रोने से वृद्धा भी उठ बैठी और सारा हाल सुनकर महादुःखित हुई । इस समय कुटीर में सूर्य्यरश्मि धीरे-धीरे आ रही थी।

अनाथिनी अनाथिनी की तरह रोने लगी। वृद्धा ने उसे बहुत समझा बुझाकर अपने जाने हुए गांवों में बालक को खोजने के लिये प्रस्थान किया । अकेली बालिका क्या करती ? बड़ी चिन्तित हुई।

उसने विचारा कि, एक दुःख के ऊपर दूसरा दुःख क्या अवश्य होता है ? हा! पिता की मृत्यु और भ्राता की चोरी! पिता ने मरते समय मेरे हाथ में सुरेन्द्र का हाथ पकड़ा दिया था। पिता तुम्हारी आत्मा इन बातों को देख कर न जाने मुझे कैसी कृतघ्न कहेगी ? मैं क्या करूं ? मैं निःसहाय और सामान्य बालिका हूं।"

अनाथिनी ने इसी तरह सोचते सोचते अपनी गठरी खोली। दो एक मैले वस्त्र निकाले, फिर न जाने क्या देख कर सहसा

उसकी चिन्ता दूर हुई । उसने देखा कि, 'कपड़े के भीतर एक पत्र पड़ा है ! आग्रह से उसे उठा लिया, और देखने से शोकराशि बढ़ गई । उसने सोचा, 'ऐं ! यह पत्र किसका है ? मेरे पिता का? फिर मन में दो एक बेर उसे पढ़ा, पर चित्त के न मानने से पुनः धीरे धीरे पढ़ा, पत्र यही था,--

"महाशय!

"आपका पत्र पाकर बहुत दुःखित हुआ, किन्तु अत्यन्त सन्तुष्ट भी हुआ । रामशङ्करबाबू का अत्याचार तो मेरे दुःख का कारण हुआ, पर अनुग्रह-पूर्वक आपका यहां आने का प्रस्ताव मेरे सुख तथा हर्ष का हेतु हुआ। जन्मभूमि में जो शत्रु लोग बहुत बढ़ जाय, तो उस प्यारी भूमि को भी छोड़ ही देना चाहिए। आप जो यहां आने में संकोच न करेंगे तो मैं अतिशय बाधित होऊँगा। मुझे आप अपने छोटे भाई की तरह जानिए । आप हमलोगों के मान्य और शुभाकांक्षी हैं। आपकी आन्तरिक इच्छा मैंने समझी, वह यहां आने पर यथासमय सम्पन्न होगी। आपने लिखा कि,-'दरिद्र व्यक्ति की कन्या के सहित संभ्रान्त पुरुष के पुत्र का विवाह किस प्रकार संभव है?'-यह तीखी बात फिर न सुनूं तो नितान्त अनुगृहीत होऊँगा। पत्र पाते ही बालिका और बालक के संग अवश्य पधारिए।

वशंवद,

श्रीहरिहरशर्मा।

पत्र को पढ़ कर अनाथिनी ने क्या सोचा ? पिता का विषय ! एक बेर यह पत्र इसके पिता के आनन्दाश्रु से आर्द्र हुआ था, आज बालिका के कोमल नेत्रों के हर्ष-विषादमय आंसुओं से भींगा!

अनाथिनी ने अनिमेष-नयनों से पत्र को बारबार देखा, फिर धीरे धीरे मोड़ कर अंचल में बांध लिया। फिर खोला, फिर पढ़ा, और फिर बांध लिया।

अनाथिनी मन में सोचने लगी कि, 'संसार में मेरे पिता के एकमात्र मित्र हरिहरबाबू ही हैं, पर उनका घर कहां है ? '

'मेरा क्या विवाह !' उन्होंने लिखा कि, 'बालक-बालिका के । संग आना ! हा ! भैया सुरेन्द्र कहां है ? पिता तो स्वर्ग गए!

- यो सोचते सोचते वह कुटीर के बाहर आई।

प्रायः दोपहर होगया था, किन्तु आकाश अभी तक मेघाच्छन्न था; इससे सूर्य के किरण की तेजी नहीं थी। सहसा कुटीर छोड़कर जिधर मुंह पड़ा, उसी ओर अनाथिनी जाने लगी। किस लिये ? छोटे भाई के खोजने को। बालिका के मन में निश्चय था कि, 'मैं अपने भाई को खोज लूंगी।' कुछ दूर जाने पर एक तिरमुहानी मिली। तीनों पथ लोगों के आने जाने बिना प्रायः असंस्कृत हो रहे थे। एक पथ में कीचड़ होने से कई मनुष्यों के पैर के चिन्ह उखड़े थे। बालिका ने देखकर वही पथ पकड़ा। वह कहां जाती है, इस पथ का कहां अन्त है, इसका कुछ ठिकाना नहीं। जाते जाते अनाथिनी एक सघन बन में पहुंची । असंख्य वृक्षराजि, अनन्त फूल-फल, अनेक पशु-पक्षी, और अशेष प्राकृतिक शोभा की रमणीयता से बन शोभायमान था। अनाथिनी को देखकर पशु-पक्षी भागने लगे। यह देख उसने मृदु स्वर से हंसकर आप ही आप कहा,-"मुझसे क्यों डरते हो ?" एक सुन्दर पुष्करिणी के निर्मल जल में जलचर कलोल करते थे। वृक्षों की शाखाओं की एकता से उस बन में सूर्य की किरण नहीं घुसने पाती थी । बालिका खड़ी हो वन की शोभा देखने लगी। अन्त में एक वृक्ष-कोटर में दो चिल्ली के बच्चों को क्रीड़ा करते देख उसने दीर्घनिश्वास त्याग करके कहा,-"इस समय भ्राता कहां है ?" उसके मन में बहुत कष्ट हुआ और वह इधर उधर टहलने लगी। कुछ दूर आगे जाने पर मनुष्य का पदचिन्ह दिखाई दिया। उसके मन में आशा हुई और कई कदम आगे जाकर कुछ देखकर वह बड़ी विस्मित हुई ! उसने देखा कि, 'एक वट-वृक्ष में जीर्ण-शीर्ण घोड़ा बंधा हैं !' अनाथिनी ने सोचा कि, 'यह अश्व किसका है और कहां से आया ?' क्यों कि वह जिस पथ से आई थी, वह यहीं समाप्त होगया था। अश्व की

ओर से आँख फेर कर सामने क्या देखा कि, एक पक्का मकान है, किन्तु भग्नप्राय होरहा है !' तब तो अनाथिनी डरी। अनन्तर भाई के खोजने की अभिलाषा ने भय को दूर किया। आशा से हृदय पूर्ण करके बालिका उस घर के आंगन में जाकर प्रेमावेश से उन्मत्त होकर हठात् "सुरेन्द्र सुरेन्द्र !” कहकर जोर से पुकारने

लगी। उस चिल्लाहट को प्रतिध्वनि ने भीषण स्वर से उत्तर दिया। प्रतिध्वनि होने के पीछे ही, "भागो! भागो! यहां क्यों प्राण देने आई हौ ?” ये शब्द अनाथिनी के कानों में गए । बालिका डर के मारे चारोंओर देखने लगी, अन्त में ऊपर एक खिड़की में अपूर्व और अकथनीय मुख दीख पड़ा। - उस मुखच्छवि से मोहित होकर बालिका ने कहा,-"ऐं ! आप मुझे यहांसे भागने के लिये क्यों कहते हैं ? क्या यहां कोई भूला-भटका बालक आया है ? "

अपरिचित,-"मैं कौन हूं ? एक अभागा आदमी। यह भग्नगृह एक दुर्दान्त कापालिक का वासस्थान है, सुतरां तुम अपनी जान लेकर अभी भागो। यहां न कोई बालक आया, और न मैंने देखा।" बालिका,-"आप अभागे क्यों हैं ? और दुष्ट कापालिक के हाथ कैसे पड़े ?"

अपरिचित,-'हा! क्या कहूं ?"

यह कहकर उसने मन में कहा,-"कुछ दिनों के बाद एक बार ही जीवन का दीप निर्वाण होगा, तब विपद के छिपाने से क्या प्रयोजन है ?"

बालिका स्थिर नेत्रों से युवक का मुख देखने लगी। अपरिचित युवा, चंचलनयनी कुतूहलाक्रांत बाला के संशय दूर करने के लिये अपना वृत्तान्त कहने लगा। वह बोला,-"एक दिन सन्ध्या के समय मैं किसी कार्य के लिये घोड़े पर चढ़कर इसी पथ से दूर किसी ग्राम की ओर जाता था। उस समय भयानक आंधी उठी और संग ही मूसलधार पानी भी बरसने लगा। अश्व की गति रुकने से निरुपाय होकर आश्रय लाभ की आशा से मैंने इस घर में प्रवेश किया। रात्रि अंधेरी थी और आगे चलने की सामर्थ्य नहीं होती थी । शरीर भी परिश्रान्त हो रहा था, अतः सोच विचार कर यहीं विश्राम किया। धीरे धीरे निद्रा आगई । प्रातः काल जाग कर देखा कि, 'मैं नरघाती कापालिक के हाथ बन्दी हूं।"

बालिका ने युवक की बात सुनकर दीर्घनिश्वास त्यागकर कहा,-"आपकी दुःख-कहानी सुनकर छाती फटी जाती है। हा! मैं क्या कुछ भी आपकी सहायता नहीं कर सकती हूं? कहिए? वह दुःखदायी शत्रु अभी कहां है ?"

युवक;-"समीपवर्ती वन में तंत्र साधन करता होगा! हा! उसने कितनों का सर्वनाश किया होगा।"

बालिका,-" आइए न ! इसी समय चुपचाप हम दोनों जने भाग चलें।"

युवक,-" सरलहृदये ! मेरे हाथ पैर शृङ्खला से बंधे हैं। मैं हिलने डोलने में संपूर्ण अक्षम हूं। अब तक अंधेरे में बैठा बैठा बड़ी चिन्ता में डूबा था। सहसा तुम्हारा कोमल स्वर कानों में गया और मैंने तब सोचा कि कोई अनाथिनी अबला कदाचित् फिर पापी कापालिक के पाले पड़ी होगी वा पड़ेगी; इसीसे तुम्हें सावधान करने के लिये बड़े कष्ट से खिड़की के पास तक सरक सरक कर आया। हा-"

युवक ने दीर्घनिश्वास लिया और बालिका ने साहस से कहा,-" तो मैं आकर आपको बेड़ी और हथकड़ी छुड़ा दूं ?"

युवक,-" कोमलहृदये ! देखो! आगे न बढ़ो! इस कारागार के द्वार का भारी ताला तोड़ना तुम्हारा काम नहीं है, वह काम दुःसाध्य है। मेरे जीवन के लिये अपना जीवन उलझाव में न फँसाओ। ओः ! जान पड़ता है कि सूर्य अस्त हुए, शीघ्र ही कापालिक आवैगा, भागो! वृथा बातों में समय बीत गया, जल्दी भागो।"

यों कहकर युवक ने मन में कहा,-" सब बात ही गुप्त रही ! रे मन ! एकाएक द्वार बन्द कर ! स्मरणशक्ति ! विलुप्त हो! क्या आत्मपरिचय दूं ? इससे क्या उद्धार होगा ? नहीं, तो फिर प्रयोजन नहीं है; कापालिक आता होगा।"

प्रकाश्य में कहा,-" कापालिक आता होगा, तुम भागो, भागो, जल्दी भागो!"

" आपने मुझे जीवनदान दिया, और मैं आपका कुछ उपकार न कर सकी, ईश्वर आपका मंगल करे।" यह कहकर रोती रोती अनाथिनी विदा हुई और डरती डरती अपनी कुटीर की ओर चली।

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