Dilkash Bagawat Ch. 1

शादी के बाद की पहली रात

Posted by Anjali Sharma • Sep 08, 2026 08:24 PM

सुबह का वक्त था। 'राठौड़ पैराडाइज़' का वो बड़ा सा मास्टर बेडरूम जितना ज्यादा लैविश और बड़ा था, वहां का सन्नाटा उतना ही चुभने वाला था। बड़ी-बड़ी खिड़कियों से हल्की धूप छनकर अंदर आ रही थी, लेकिन कमरे का माहौल बहुत भारी लग रहा था।

उसी बड़े से किंग-साइज़ बेड के किनारे बैठी थी एक दुल्हन। सुर्ख लाल लहंगे और भारी जूलरी में लिपटी हुई। उसका चेहरा इतना खूबसूरत था कि कोई भी देखता रह जाए, मासूम सा गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और बड़ी-बड़ी आंखें। पर उस खूबसूरती पर शादी की कोई खुशी या चमक नहीं थी। चेहरे पर सिर्फ डर, बेचैनी और एक अजीब सी उलझन साफ दिख रही थी। उसकी सांसें अटक रही थीं। इतना बड़ा कमरा होने के बावजूद उसे वहां भयानक घुटन महसूस हो रही थी। वो बार-बार अपनी सहमी नजरों से कमरे के कोने-कोने को देख रही थी। उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ ये सब हो क्या गया है, उसकी जिंदगी अचानक कहां आकर फंस गई है। घबराहट इतनी थी कि उसके हाथ कांप रहे थे। उसने दोनों हाथों से बेडशीट को जोर से पकड़ रखा था और अपनी मुट्ठियों में उसे बुरी तरह मरोड़े जा रही थी। सिल्क की चादर पर सिलवटें पड़ चुकी थीं, ठीक वैसे ही जैसे उसके दिमाग में सवालों का तूफान चल रहा था।

तभी... वॉशरूम का भारी दरवाजा खुला। अंदर से भाप के साथ एक लंबा-चौड़ा, मस्कुलर शख्स बाहर निकला। वो एक हाथ से टॉवल से अपने गीले बाल पोंछ रहा था। बालों से पानी की कुछ बूंदें टपक कर उसके चौड़े कंधों और सीने पर फिसल रही थीं। नीचे उसने सिर्फ एक डार्क कलर का लोअर पहन रखा था, ऊपर से बिल्कुल शर्टलेस। बॉडी ऐसी जिसे देखकर ही सामने वाले पर एक रोब जम जाए। चेहरे पर किसी तरह के कोई इमोशन्स नहीं थे, सिर्फ एक ठंडी, बेपरवाह और खतरनाक सी खामोशी।

उसके बाहर आते ही कमरे का टेम्परेचर जैसे एकदम से बदल गया। वॉशरूम से निकलते ही उसकी सर्द निगाहें सीधे उस दुल्हन पर पड़ीं। जैसे ही दोनों की नज़रें टकराईं, दुल्हन के दिल की धड़कन जैसे हलक में आ गई। उसने घबराकर झटके से अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। बेडशीट को छोड़कर वो हड़बड़ाहट में उठी और कुछ कदम पीछे हटकर एक साइड टेबल के पास जाकर खड़ी हो गई। सामने खड़े उस शख्स ने भी अपनी नज़रें उस पर ज्यादा देर नहीं टिकाईं। उसके चेहरे पर बिल्कुल कोल्ड एक्सप्रेशन्स थे, जैसे सामने कोई इंसान नहीं बल्कि कोई बेजान चीज़ खड़ी हो। लेकिन अगले ही पल, वो लंबे-लंबे कदम बढ़ाता हुआ सीधा उसी की तरफ आने लगा।

उसे अपनी तरफ आते देख दुल्हन बुरी तरह सहम गई। ये बिल्कुल अनएक्सपेक्टेड था। उसका पूरा **** कांप उठा। उसने डर के मारे अपने भारी लहंगे को दोनों हाथों से कसकर भींच लिया और आंखें बंद कर लीं, दिल में सिर्फ यही डर था कि अब क्या होगा। वो उसके बिल्कुल करीब आया... इतना करीब कि उसकी गर्म सांसें और गीले बदन से आती फ्रेश शावर जेल की खुशबू हवा में घुल गई। दुल्हन की सांसें अटक गईं। पर उसने दुल्हन को छुआ तक नहीं। उसने हाथ बढ़ाया और ठीक उसके पीछे टेबल पर रखा अपना फोन उठा लिया। एक नज़र भी उस पर डाले बिना, वो साइड वार्डरोब की तरफ मुड़ा, वहां से एक ब्लैक टी-शर्ट निकाली, उसे पहना और बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल गया।

दरवाज़ा बंद होते ही दुल्हन ने एक लंबी, कांपती हुई राहत की सांस ली। उसकी टांगें जैसे उसका साथ छोड़ चुकी थीं, इसलिए उसने लड़खड़ाते हुए टेबल का सहारा ले लिया।

राहत तो मिली थी कि आखिरकार वो उस कमरे में अकेली थी, लेकिन सीने में उठता दर्द अब और भी गहरा हो चुका था। आंखों में आंसू उमड़ रहे थे, गला बुरी तरह रुंधा हुआ था, मगर दिल के अंदर मची इस भयानक उथल-पुथल के बीच वो खुलकर रो भी नहीं पा रही थी।

उसके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था...आखिर वो यहां क्यों थी? अगर उसकी शादी टूटनी ही थी, तो वहीं टूट जाती। उसे इस तरह एक रिश्ते से निकालकर दूसरे रिश्ते में क्यों धकेला गया? वो कोई चीज़ तो नहीं थी, जिसे एक भाई ने ठुकरा दिया तो दूसरे भाई ने अपना लिया। वो भी इसलिए, ताकि दुनिया और समाज की नजरों में उस परिवार की इज्जत बनी रहे। आखिर उसकी अपनी कोई इज्जत, कोई मर्जी, कोई जिंदगी नहीं थी क्या? क्या वो सिर्फ एक ऐसा रिश्ता थी, जिसे समाज के सामने बदनामी से बचाने के लिए किसी के नाम कर दिया जाए?

इन सवालों ने उसके भीतर का सारा सब्र तोड़ दिया और उसकी आंखों से आखिरकार आंसू छलक पड़े।

वो अभी खुद में उलझी ही थी कि तभी कमरे के खुले दरवाज़े पर किसी के सैंडल्स की खट-खट सुनाई दी। एक लड़की कमरे के अंदर दाखिल हुई। चेहरे पर तीखा घमंड और आंखों में साफ नापसंदगी और तिरस्कार था। वो चलकर सीधे उस सहमी हुई दुल्हन के सामने आकर खड़ी हो गई।

उसने दुल्हन को सिर से पैर तक एक हिकारत भरी नज़र से देखा, फिर उसके चेहरे पर एक तंजिया मुस्कान आ गई।

"ज़रूरी नहीं कि हर बार किस्मत अच्छी हो..." लड़की ने अपनी बाहें सीने पर बांधते हुए कहा, उसकी आवाज़ में चुभन साफ थी, "लेकिन तुम्हारी किस्मत शायद ज़रूरत से ज़्यादा ही अच्छी है। बाहर जाते-जाते... धक्के खाकर भी तुम फिर से इसी पैराडाइज़ में आ गिरीं।"

दुल्हन ने सहमी नज़रों से उसकी तरफ देखा, पर कुछ बोल नहीं पाई।

लड़की एक कदम और आगे बढ़ी और चेहरे पर एक फीकी सी हंसी लाकर बोली, "पर इतना याद रखना, इस चारदीवारी के अंदर आने का मतलब ये नहीं कि तुम यहां की मालकिन बन गई हो। राठौड़ पैराडाइज़ की हवा में सांस लेने की भी एक कीमत होती है, और तुम... तुम तो वो कीमत कभी चुका ही नहीं पाओगी। अपने इस मासूम चेहरे का नाटक किसी और को दिखाना, यहां कोई पिघलने वाला नहीं है।"

दुल्हन अच्छी तरह जानती थी कि सामने खड़ी ये लड़की कोई और नहीं, बल्कि प्रखर की बड़ी बहन रिद्धिमा राठौड़ है, वही रिद्धिमा जिसका मिज़ाज इस घर में सबसे तीखा और बेबाक माना जाता था। रिद्धिमा की नज़रों में उसके लिए ज़रा भी रहम नहीं था।

रिद्धिमा ने उसे एक बार फिर ऊपर से नीचे तक घूरा और तंज भरे लहजे में बोली, "अब क्या सारा दिन इसी लहंगे में खड़ी रहकर खुद की खूबसूरती को निहारना है? जो करना था वो तो कर ही लिया... पूरा खेल बिगाड़ कर अब ये मासूम बनने का ड्रामा किसे दिखा रही हो?"

इतनी कड़वाहट उड़ेलने के बाद, रिद्धिमा ने एक झटके से अपना मुंह फेरा और पैर पटकती हुई कमरे से बाहर निकल गई। दुल्हन वहीं बुत बनी खड़ी रह गई। उसका दिमाग बुरी तरह चकरा गया था। उसे उन बातों का मतलब समझ नहीं आ रहा था, बस ये महसूस हो रहा था कि ये जगह उसके लिए किसी दलदल से कम नहीं है। वो लाख कोशिश करके भी समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ये लोग उससे चाहते क्या हैं, और रिद्धिमा की इन कड़वी बातों के पीछे असल में कौन-सा सच छुपा था।

उधर, रिद्धिमा सीढ़ियों की तरफ तेज़ी से बढ़ रही थी कि तभी सामने से आती एक लड़की से उसकी टक्कर होते-होते बची।

सामने खड़ी थी इस घर की मंझली बहू, युग राठौड़ की पत्नी, सहर।

सहर की खूबसूरती का अंदाज़ ही अलग था। एक ठहराव, एक शालीनता जो उसकी बड़ी-बड़ी गहरी आँखों और चेहरे की सादगी से साफ़ झलकती थी। उसने एक मॉडर्न और बेहद एलिगेंट पेस्टल शेड की साड़ी पहन रखी थी, जिसे कमर पर एक स्लीक मेटैलिक बेल्ट से स्टाइल किया गया था। वो साड़ी उसके पतले, नज़ाकत भरे फिगर पर कमाल लग रही थी, और उसका ये सोफिस्टिकेटेड अंदाज़ उसे बाकी सबसे बिल्कुल अलग दिखाता था।

रिद्धिमा ने भौंहें सिकोड़कर उसे टोका, "तुम ऊपर कहाँ जा रही हो?"

सहर ने हल्की हिचकिचाहट के साथ धीमे से कहा, "वो... भाभी ऊपर अकेली हैं। सोच रही थी एक बार जाकर देख लूँ कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं..."

"ज़रूरत?" रिद्धिमा ने बीच में ही बात काटते हुए तल्ख़ी से कहा, "अच्छी तरह जानती हूँ कि वो तुम्हारी जेठानी है, लेकिन यहाँ ज़्यादा बहन बनने की कोशिश मत करो। रहने दो अभी उसे अकेले! वैसे भी बहुत तमाशा हो चुका है इस घर में, अब और तमाशा खड़ा करने की ज़रूरत नहीं है।"

सहर को रिद्धिमा की ये बेरुखी बेहद अजीब और चुभने वाली लगी। उसके चेहरे पर उदासी का एक साया लहरा गया, पर रिद्धिमा के तीखे तेवर और इस हवेली में उसके दबदबे के आगे वो कुछ कह नहीं सकी।

सहर ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही। जब रिद्धिमा पैर पटकती हुई नीचे उतर गई, तब सहर ने अपनी नज़रें उठाईं और सीधे ऊपर प्रखर के उस बंद कमरे की तरफ देखा।

उसकी आँखों में बेइंतहा फ़िक्र थी। उसने एक गहरी, भारी सांस ली और अपने आप से ही बिल्कुल धीमे से बुदबुदाई, "पता नहीं मन्नत भाभी कैसी होंगी... भैया तो कमरे में टिके ही नहीं। जाने कैसे ये रिश्ता आगे बढ़ेगा... बढ़ेगा भी या नहीं..."

एक अजीब सी बेबसी उसके चेहरे पर तैर गई। कुछ पल उसी तरफ देखने के बाद, उसने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा संभाला, अपनी बेल्ट को हल्का सा ठीक किया और भारी मन से सीढ़ियों से नीचे की तरफ बढ़ गई।

नीचे का मंज़र किसी उजड़ते हुए जश्न जैसा लग रहा था। 'राठौड़ पैराडाइज़' का वो विशाल हॉल, जो कुछ घंटों पहले तक शादी की जगमगाहट, फूलों की महक और रौनक से भरा हुआ था, अब पूरी तरह शांत और तनाव से भरा था। घर के नौकर खामोशी से सारे डेकोरेशन को हटाने में जुटे हुए थे। गेंदे और गुलाब की लड़ियाँ, जो खुशियों की गवाही दे रही थीं, उन्हें बेदर्दी से नोचकर टोकरियों में भरा जा रहा था। किसी के चेहरे पर कोई बात नहीं थी, सिर्फ एक अजीब और भारी सन्नाटा था जो चीख-चीख कर कह रहा था कि इस घर में कुछ बहुत गलत हुआ है।

रणवर्धन राठौड़ जी और वसुंधरा राठौड़ दोनों लिविंग एरिया में सोफे पर बैठे थे। दोनों के चेहरों पर गहरी शिकन थी।

तभी सीढ़ियों से उतरते ही रिद्धिमा सीधे उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में गुस्सा और बेचैनी साफ छलक रही थी। उसने हाथ हवा में लहराते हुए तल्ख़ आवाज़ में कहा, "ये सब नहीं करना चाहिए था डैड! आप दोनों को अंदाज़ा भी है कि आपने क्या किया है? पता है प्रखर को इस वक्त कैसा लग रहा होगा? आप सब अच्छी तरह जानते हैं कि ये शादी उसके लिए सिर्फ और सिर्फ एक बोझ बनकर रह जाएगी! वो कभी इस रिश्ते को दिल से कबूल नहीं करेगा, फिर क्यों ज़बरदस्ती ये सब उस पर थोप दिया गया?"

वसुंधरा जी ने बेबसी से अपनी बेटी की तरफ देखा, लेकिन कुछ बोल नहीं पाईं।

तभी गंभीर आवाज़ में रणवर्धन जी बोले। उनके चेहरे पर एक सख्त ठहराव था, जिसमें कोई पछतावा नहीं दिख रहा था। उन्होंने गहरी नज़र अपनी बेटी पर डाली और दो-टूक लहजे में कहा, "रिद्धिमा, चुप रहो। हमने जो भी फैसला लिया है, बहुत सोच-समझ कर लिया है। इस खानदान की इज़्ज़त और हालात को देखकर ही ये कदम उठाया गया है। अब जो हो चुका है, उस पर बहस करने का कोई मतलब नहीं। बेहतर होगा कि तुम इस मामले में दखल न दो।"

रणवर्धन जी का ये कड़ा रुख देखकर रिद्धिमा ने गुस्से से अपने होंठ भींच लिए, पैर पटके और वहां से दूसरी तरफ निकल गई।

उधर, उस विशाल मास्टर बेडरूम में वक्त जैसे पूरी तरह थम गया था। सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम ढलने को आ गई, लेकिन मन्नत के कमरे की चौखट पर किसी ने कदम तक नहीं रखा। न कोई पानी पूछने आया, न ही किसी ने हाल-चाल जानने की ज़हमत उठाई। पूरा दिन वो उसी भारी, चुभते हुए लहंगे और गहनों के बोझ तले घुटती रही। गले में प्यास से कांटे पड़ चुके थे और बदन दर्द से टूटने लगा था। उसने हिम्मत जुटाई और कमरे में इधर-उधर अपने कपड़े तलाशने लगी कि कम से कम ये भारी जोड़ा उतारकर कोई आसान कपड़ा पहन सके। उसने वार्डरोब के एक-दो पल्ले खोलकर देखे, पर वहां सिर्फ प्रखर के सूट, शर्ट्स और घड़ियां करीने से सजी हुई थीं। कमरे के किसी भी कोने में उसका अपना कोई सूटकेस या बैग तक मौजूद नहीं था। किसी ने उसका सामान उस कमरे तक पहुंचाने की परवाह ही नहीं की थी।

थक-हार कर, टूटे हुए मन के साथ मन्नत उसी बड़े से बेड के कोने पर ज़मीन के करीब सिर झुकाए बैठ गई। भूख, प्यास और अकेलेपन से ज़्यादा उस पर उस सन्नाटे का खौफ़ हावी हो रहा था। उसे अहसास हो रहा था कि इस आलीशान महल में उसका वजूद किसी अनचाहे साये से बढ़कर कुछ नहीं था। देखते ही देखते खिड़कियों के बाहर का उजाला खत्म हो गया और रात का घना अंधेरा 'राठौड़ पैराडाइज़' को अपनी आगोश में लेने लगा।

कमरे में सिर्फ बेडसाइड लैंप की मद्धम, पीली रोशनी जल रही थी, जो वहां फैले सन्नाटे को और ज़्यादा डरावना बना रही थी। रात के गहराते ही हवेली में बिल्कुल खामोशी छा चुकी थी, पर मन्नत के सीने में धड़कनों का शोर बढ़ता जा रहा था। उसे अच्छी तरह पता था कि रात ढलने का मतलब है, प्रखर का उस कमरे में वापस लौटना।

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