प्रखर की नजरें ठहरीं मन्नत के भीगे **** पर
कमरे में फैला सन्नाटा मन्नत की सांसों पर भारी पड़ रहा था। भूख और प्यास से उसका बुरा हाल था, बदन भारी लहंगे के बोझ से टूट रहा था, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। उस अनजाने डर के साए में वह बेड के कोने पर सिर झुकाए बिल्कुल चुपचाप बैठी रही। पल-पल बीत रहा था और हर आहट पर उसका दिल दहल उठता कि कहीं दरवाज़ा न खुल जाए।
घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती जा रही थीं। रात गहरा चुकी थी, पर प्रखर अब तक घर नहीं लौटा था।
नीचे लिविंग एरिया में बेचैनी का माहौल था। सोफे पर बैठे रणवर्धन राठौड़ जी के चेहरे पर साफ तनाव नज़र आ रहा था। कभी वो घड़ी देखते, तो कभी मेन गेट की तरफ।
आखिरकार उन्होंने अपनी बेटी की तरफ रुख किया। "रिद्धिमा, प्रखर को फोन लगाओ और कहो कि बिना कोई बहाना बनाए अभी इसी वक्त घर पहुंचे।"
"जी डैड।" रिद्धिमा ने तुरंत अपना फोन निकाला। उसने नंबर डायल किया और कॉल कनेक्ट होते ही बोली, "प्रखर, तुम कहाँ हो? डैड बहुत गुस्से में हैं, सब इंतज़ार कर रहे हैं... अभी के अभी घर आओ।" सामने से क्या जवाब मिला ये तो नहीं पता चला, पर रिद्धिमा ने फोन काटकर सिर हिला दिया कि वो आ रहा है।
तभी हवेली के बड़े से मेन डोर पर तेज़ कदमों की आवाज गूंजी।
दरवाजे से एक नौजवान ने अंदर कदम रखा—वो समर राठौड़ था, इस घर का सबसे छोटा बेटा। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, जैकेट कंधे पर लटकी थी और चेहरे पर एक अजीब सी अकड़ और बेपरवाही तैर रही थी। जैसे ही उसने कदम अंदर रखे, हॉल में मौजूद हर शख्स की नजरें सीधे उसी पर जाकर टिक गईं।
समर ने किसी की तरफ देखने की ज़हमत तक नहीं उठाई। उसने एक नजर भी वहां बैठे अपने माता-पिता पर नहीं डाली और बिना कुछ बोले सीधे सीढ़ियों की तरफ मुड़कर ऊपर जाने लगा।
"समर!" रणवर्धन जी की भारी और रौबदार आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी। "यूं मुंह छिपाकर भागने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। पलट कर खड़े हो जाओ!"
समर के कदम वहीं थम गए। उसने पीछे मुड़कर देखा, चेहरे पर ज़रा भी शिकन या पछतावा नहीं था। उसने तल्ख लहजे में बहस छेड़ दी।
"मुझे किसी से मुंह छिपाने की ज़रूरत नहीं है डैड! और न ही मैं भाग रहा हूँ। मैंने कुछ ऐसा गलत नहीं किया जिसके लिए मुझे किसी के सामने सिर झुकाना पड़े।"
वसुंधरा जी से अब रहा नहीं गया। उन्होंने दुखी और गुस्से भरी नजरों से अपने छोटे बेटे को देखा, "समर! इतनी बड़ी बात हो गई और तुम्हें अब भी अपनी गलती का ज़रा सा भी अहसास नहीं है?"
रणवर्धन जी सोफे से उठ खड़े हुए, उनकी आंखों से अंगारे बरस रहे थे। "तुम्हें अंदाजा भी है कि तुमने आज क्या किया है? अपनी मनमर्जी के चक्कर में पूरे खानदान की इज्जत को दांव पर लगा दिया! अगर आज बात न संभाली जाती, तो राठौड़ खानदान का नाम मिट्टी में मिल चुका होता। तुम्हें क्या लगता है, सब कुछ आसान था? किस तरह हमने दुनिया के सामने इस घर की साख बचाई है, इसका एक कतरा भी तुम्हें समझ नहीं आ सकता!"
समर ने अपने होंठ भींचे, गुस्से से मुंह ऐंठा और बिना कोई सफाई दिए एक झटके से सीढ़ियां चढ़ता हुआ अपने कमरे की तरफ चला गया।
रणवर्धन जी ने बेबसी और गुस्से के मिले-जुले भाव से अपनी पत्नी वसुंधरा जी की तरफ देखा और तंजिया लहजे में बोले, "देख लो अपने लाडले को। सबसे छोटे हैं न... इसलिए इनके तेवर सातवें आसमान पर हैं। कोई लगाम ही नहीं है इस पर!"
ये सुनकर रिद्धिमा फौरन बीच में कूद पड़ी। "लेकिन डैड, समर की उतनी भी गलती नहीं है जितना आप लोग उसे सुना रहे हैं! आखिर उसकी भी तो अपनी मर्जी है, अपनी लाइफ है। और वैसे भी... उस लड़की में ऐसा था ही क्या जिसके लिए समर अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा देता?"
रणवर्धन जी ने कड़े स्वर में उसे टोकते हुए दो-टूक कहा, "क्योंकि वो रिश्ता मैंने तय किया था रिद्धिमा! और मेरे फैसले पर सवाल उठाने की हिम्मत इस घर में किसी की नहीं होनी चाहिए।"
रिद्धिमा फिर से चिढ़कर कुछ बोलने ही वाली थी कि पास ही खड़ी सहर ने धीरे से अपनी नजरें घुमाईं और अपने ही मन में बुदबुदाते हुए तंज कसा, "लो... आ गईं महानता की देवी सबके सामने महान बनने।"
सहर की धीमी आवाज तो किसी को नहीं सुनाई दी, लेकिन रिद्धिमा बात आगे न बढ़ा सकी। वो गुस्से से पैर पटकती हुई समर को समझाने या उसका पक्ष लेने के लिए उसके पीछे-पीछे ऊपर की तरफ चली गई।
उसे ऊपर जाते देख सहर के चेहरे पर एक हल्की सी तंजिया मुस्कान आई और उसने फिर से धीमे से कहा, "बस यही बाकी रह गया था..."
अभी सहर के मुंह से ये लफ्ज़ निकले ही थे कि मेन डोर की तरफ हवा का रुख एकदम से बदल गया।
बाहर एक गाड़ी के रुकने और दरवाजे के जोर से बंद होने की आवाज आई। और अगले ही पल... पूरे रुआब और ठंडे तेवरों के साथ हॉल में दाखिल हुआ इस खानदान का सबसे बड़ा बेटा प्रखर राठौड़।
प्रखर के भारी कदमों की आहट पूरे हॉल में गूंज उठी। ब्लैक शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं, एक हाथ में उसका कोट और गाड़ी की चाबियां थीं, और चेहरे पर वही बेपरवाह, सख्त और खामोश तेवर। उसने हॉल में मौजूद किसी भी शख्स की तरफ एक नजर तक नहीं डाली। न अपने पिता को देखा, न मां को, और न ही वहां खड़ी सहर को।
वो बिना रुके, सीधे सीढ़ियों की तरफ बढ़ रहा था, जैसे उस बड़े से हॉल में उसके सिवा कोई और मौजूद ही न हो।
"प्रखर..." वसुंधरा जी की आवाज में एक मां की बेचैनी और दर्द साफ झलक रहा था।
प्रखर के कदम वहीं थम गए। उसने पीछे मुड़कर अपनी मां की तरफ नहीं देखा, बस वहीं खड़े-खड़े अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। जबड़े भिंचे हुए थे और आंखों में वही खतरनाक, कोल्ड एक्सप्रेशन्स।
वसुंधरा जी आगे बढ़ीं, उनके चेहरे पर गहरी परेशानी थी। उन्होंने भर्राई हुई आवाज में कहा, "प्रखर बेटा... तू तो समझता है न? तुझे तो पता है कि तेरे डैड ने जो कुछ भी किया, क्यों किया? तू कम से कम हमसे ऐसे मुंह मोड़ कर तो मत जा।"
प्रखर के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं उभरी। उसकी खामोशी उस पूरे हॉल के सन्नाटे से ज्यादा भारी लग रही थी।
तभी रणवर्धन जी अपनी जगह से थोड़ा आगे आए। उनकी आवाज में एक भारीपन था, लेकिन फैसले पर कोई पछतावा नहीं। उन्होंने प्रखर की चौड़ी पीठ को देखते हुए कहा, "उस वक्त जो हालात थे प्रखर, उसमें जो सबसे ज्यादा जरूरी था, वही मैंने किया। घर के छोटे बेटे ने अपनी नादानी में एक पल के लिए भी खानदान के बारे में नहीं सोचा... अपनी मर्जी के आगे पूरे परिवार को दांव पर लगा दिया। लेकिन तुम इस घर के बड़े बेटे हो। और एक बड़ा बेटा होने के नाते, ये तुम्हारी जिम्मेदारी थी कि तुम आगे आकर इस घर की इज्जत को बचाओ।"
रणवर्धन जी एक पल के लिए रुके, फिर सीधे लहजे में बोले, "उस मंडप से अगर बारात बिना दुल्हन के लौटती, तो राठौड़ खानदान का सर हमेशा के लिए झुक जाता। तुमने उस वक्त जो किया, वो इस परिवार की साख के लिए जरूरी था।"
हॉल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया। वसुंधरा जी बेबसी से प्रखर के जवाब का इंतजार कर रही थीं, लेकिन प्रखर ने न कोई शिकायत की, न कोई सवाल।
उसने बस एक गहरी सांस ली, और उसी ठंडे, पथरीले चेहरे के साथ बिना एक भी लफ्ज कहे, अपने कदम दोबारा सीढ़ियों की तरफ बढ़ा दिए।
प्रखर के भारी कदमों की आवाज़ सीढ़ियों पर धीरे-धीरे मद्धम पड़ गई और ऊपर उसका दरवाज़ा बंद होने की हल्की सी गूँज नीचे तक आई। हॉल में फिर से वही चुभने वाला सन्नाटा फैल गया था। रणवर्धन जी की नज़रें उसी ख़ाली सीढ़ियों पर टिकी थीं, जबकि वसुंधरा जी के चेहरे पर एक गहरी, अनकही तकलीफ़ थी।
तभी ख़ामोशी को तोड़ते हुए सहर धीरे से आगे बढ़ी। उसने दोनों की तरफ बहुत नर्मी और अपनेपन से देखा और बड़े सधे हुए लहज़े में बोली, "मम्मी जी, डैड... भैया को थोड़ा सा वक़्त दीजिए। वो अभी भी अपनी पुरानी यादों से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। उनके सीने में जो दर्द है, वो इतना आसान नहीं है भूल जाना। लेकिन मुझे दिल से लगता है कि ये रिश्ता भी माता रानी ने किसी ख़ास वजह से ही जोड़ा है... शायद इसलिए, ताकि वो उन पुराने ज़ख़्मों से हमेशा के लिए बाहर आ सकें।"
रणवर्धन जी और वसुंधरा जी दोनों ने मुड़कर सहर की तरफ देखा।
सहर ने एक धीमी, समझदारी भरी सांस ली और आगे कहा, "हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि हालात चाहे जैसे भी होते, भैया अपनी मर्ज़ी से कभी शादी के लिए हाँ नहीं करते। 'शादी' लफ्ज़ तक से उन्हें एक नफ़रत सी हो चुकी थी। पर जो हुआ, शायद उसी में कोई बेहतरी छुपी हो। मन्नत भाभी बहुत सीधी और मासूम हैं... क्या पता वही भैया की ज़िंदगी में वो खोई हुई ख़ुशियाँ और सुकून वापस ले आएँ।"
सहर की बातों में इतनी सच्चाई और उम्मीद थी कि हॉल में मौजूद दोनों बड़ों के पास कहने को कोई लफ़्ज़ नहीं बचा। चारों तरफ बस एक ख़ामोश ठहराव था। जब किसी ने कुछ नहीं कहा, तो सहर ने आहिस्ता से सर झुकाया, अपनी साड़ी संभाली और चुपचाप अंदर की तरफ चली गई।
उसके जाने के बाद वसुंधरा जी ने बेबसी से अपनी पलकें झपकाईं, उनकी आँखों में हल्की सी नमी तैर गई थी। उन्होंने अपने पति की तरफ देखा और भर्राई हुई आवाज़ में बोलीं, "काश... काश सहर की एक-एक बात सच साबित हो जाए। मैं बस इतना ही तो चाहती हूँ कि मेरा बेटा भी बाकी सबकी तरह हँसे, बोले, मुस्कुराए... अपनी ज़िंदगी जिए। कब तक वो उस अंधेरे को अपने सीने से लगाए घूमेगा?"
रणवर्धन जी ने फ़ौरन कोई जवाब नहीं दिया। वे ख़ामोशी से सामने देखते रहे, पर उनके माथे पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं। उनके दिमाग़ में एक भयानक डर दस्तक दे रहा था।
वे मन ही मन सोच रहे थे कि सहर की उम्मीद अपनी जगह सही है, लेकिन हक़ीक़त बहुत ख़ौफ़नाक थी। अगर प्रखर अपने उस दर्दनाक पास्ट के साए से बाहर नहीं निकल पाया... अगर वो मन्नत को कभी अपना ही नहीं सका, तो सब कुछ फिर से उसी ख़तरनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो जाएगा, जहाँ से उन्होंने सालों की मशक़्क़त के बाद किसी तरह अपने बेटे को खींचकर बाहर निकाला था।
और अगर इस बार वो बिखरा, तो शायद इस पूरे खानदान को समेटना नामुमकिन हो जाएगा।
ऊपर उस बड़े से कमरे में मन्नत की हालत बदतर हो चुकी थी।
रात के सन्नाटे में वो अब भी उसी भारी-भरकम, चुभते हुए सुर्ख लहंगे और जूलरी में लिपटी बेड के किनारे ज़मीन से टेक लगाए बैठी थी। पूरा दिन बीत चुका था, पेट में भूख की वजह से मरोड़ उठ रहे थे और होंठ प्यास से सूख चुके थे। थकान इतनी हावी हो रही थी कि उसकी पलकें अपने आप भारी होकर गिर रही थीं।
वो बार-बार झपकी लेती, लेकिन डर और बेचैनी के मारे झटके से उसकी आँखें खुल जातीं। हर आहट पर एक उम्मीद सी जगती कि शायद इस घर में कोई तो होगा जिसे उस पर तरस आए... शायद कोई पानी का एक घूंट या चेंज करने के लिए कोई कपड़ा ही ले आए। उधर सहर का दिल तड़प रहा था ऊपर आने के लिए, पर रिद्धिमा के तीखे तेवरों और घर के बिगड़े माहौल की वजह से वो भी चाहकर भी अपनी जेठानी के पास नहीं पहुँच पा रही थी।
थकान और भूख से मन्नत का सर चकराने लगा। आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा तो उसने सोचा कि कम से कम मुंह पर पानी मार ले, शायद थोड़ी ताजगी आए और भारीपन कम हो।
कांपते पैरों से वो किसी तरह संभलकर उठी। अपने भारी लहंगे को दोनों हाथों से समेटते हुए वो वॉशरूम की तरफ बढ़ी। उसने बेसिन का नल खोला और हथेलियों में पानी भरकर जैसे ही चेहरे पर छींटे मारने लगी, उसके भारी लहंगे का लंबा दुपट्टा और आस्तीनें नल के तेज बहाव में उलझ गईं।
घबराहट में उसका हाथ मुड़ा और नल का एंगल बदलते ही पानी का तेज फव्वारा सीधे उसके सीने और चेहरे पर बिखर गया। उसने हड़बड़ा कर नल बंद तो किया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
उसका सुर्ख लाल लहंगा, आगे का गला और आंचल पानी से बुरी तरह भीग चुके थे। गीले कपड़े उसके बदन से चिपक गए थे, और बालों की भीगी लटें चेहरे और गर्दन पर आ गिरी थीं। वो हताश होकर, लगभग रोने वाली सूरत बनाए खुद को संभालने की कोशिश करते हुए वॉशरूम के दरवाजे तक आई।
तभी... कमरे का main दरवाज़ा एक झटके से खुला।
मन्नत का दिल हलक में आ गया।
सामने प्रखर खड़ा था। उसने जैसे ही कमरे में कदम रखा, उसकी नज़रें सीधे वॉशरूम की चौखट पर ठिठक गईं।
वहाँ मन्नत खड़ी थी ,,पूरी तरह पानी से भीगी हुई, अस्त-व्यस्त, चेहरे पर मासूम सा खौफ़, और बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों में बेबसी के आंसू। भीगा हुआ लाल जोड़ा उसके **** की नज़ाकत को बयां कर रहा था, और पानी की चंद ठंडी बूँदें उसकी ठुड्डी से फिसलकर नीचे गिर रही थीं।
कमरे में एक बार फिर वही सर्द, भारी सन्नाटा खिंच गया, और प्रखर की गहरी, काली आँखें सीधे उस भीगी हुई दुल्हन पर जम गईं।
To be continued ✍️