“हमारे बीच कभी पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं होगा”
दरवाज़ा खुला और प्रखर के क़दम वहीं चौखट पर जम गए। उसकी गहरी, सर्द निगाहें सीधे मन्नत पर जा टिकीं।
मन्नत का पूरा हुस्न उस वक़्त जैसे सामने खुल पड़ा था। पानी से भीगा हुआ सुर्ख लाल दुपट्टा उसके सीने से बुरी तरह चिपक चुका था, जिससे उसका नज़ाकत भरा और तराशा हुआ हॉट फिगर साफ़ छलक रहा था। पतली सी कमर, भीगे कपड़े में से उभार लेती उसकी बॉडी की हर कर्व और गोरी गर्दन पर चिपकी हुई बालों की भीगी लटें... सब कुछ इतना कातिलाना और हसीन था कि किसी की भी धड़कनें बेकाबू हो जाएँ।
प्रखर की गहरी नज़रों को अपने ऊपर महसूस करते ही मन्नत की रूह कांप गई। उसे अचानक अहसास हुआ कि उसका भीगा हुआ दुपट्टा उसके बदन को ढंकने के बजाय और ज़्यादा नुमायाँ कर रहा है। वो बुरी तरह घबरा गई। चेहरे पर गहरा लाल रंग चढ़ आया और उसने हड़बड़ाहट में दोनों हाथों से अपने सीने पर दुपट्टा समेटने की नाकाम कोशिश की। शर्म और डर के मारे उसकी पलकें ज़मीन से जा लगीं।
प्रखर के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं उभरी। उसने अपनी नज़रों को बिना किसी झिझक के सीधा उसके चेहरे पर टिकाया और अपनी भारी, कोल्ड आवाज़ में पूछा, "अब तक कपड़े चेंज क्यों नहीं किए? और इस तरह भीगी हुई क्यों खड़ी हो?"
मन्नत का गला सूख चुका था। वो बस सहमी हुई हिरणी की तरह उसे देखती रही, होंठ थरथरा रहे थे पर मुंह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।
काफ़ी देर तक जब मन्नत की तरफ से कोई जवाब नहीं आया, तो प्रखर ने ज़रा सा माथा सिकोड़ा। उसने अपनी जेब में हाथ डालते हुए सख्त लहज़े में कहा, "कुछ पूछ रहा हूँ मैं... कुछ कहना है या पत्थर बन कर ही खड़ी रहोगी?"
प्रखर के कड़े तेवर देखकर मन्नत ने किसी तरह अपनी कांपती आवाज़ में हिम्मत जुटाई। उसकी आँखें भर आईं और उसने बिल्कुल धीमे से कहा, "वो... सुबह से इस कमरे में कोई आया ही नहीं। मुझे किसी से अपने सूटकेस के लिए कहने का मौका ही नहीं मिला... और अलमारी में मेरे कोई कपड़े नहीं थे।"
मन्नत की ये बेबसी सुनकर प्रखर के चेहरे पर एक पल के लिए ठहराव आया। वो समझ गया कि आज हवेली में जो भारी तमाशा और बवाल हुआ था, उस उथल-पुथल के चक्कर में सब कुछ गड़बड़ हो गया था। किसी ने भी इस लड़की की तरफ ध्यान देने की ज़हमत नहीं उठाई थी। अब हालात चाहे जो भी रहे हों, शादी तो हो ही चुकी थी—भले ही ये शादी उन दोनों में से कोई नहीं चाहता था, पर ये हक़ीक़त थी कि इस वक़्त वो इसी कमरे में, उसकी छत के नीचे थी।
प्रखर ने एक गहरी सांस ली। "यहीं रुको!" उसने दो-टूक कहा, पलटकर दरवाज़ा खोला और बाहर खड़े एक नौकर को आवाज़ देकर मन्नत का सूटकेस तुरंत कमरे में पहुँचाने का हुक्म दिया।
चंद मिनटों के भीतर एक नौकर सहमा हुआ सूटकेस कमरे के अंदर रखकर बाहर निकल गया।
प्रखर बिना कुछ बोले बालकनी की तरफ बढ़ गया, ताकि मन्नत को प्राइवेसी मिल सके। मन्नत ने जल्दी से अपना सूटकेस खोला, उसमें से एक बहुत ही सिंपल, कॉटन का हल्का-फुल्का सूट निकाला और वॉशरूम में जाकर चेंज कर लिया। वो भारी-भरकम, चुभने वाला लहँगा और वज़नी जूलरी उतारने के बाद उसने राहत की एक गहरी सांस ली।
उसने एक सूखा तौलिया उठाया और आईने के सामने खड़े होकर आहिस्ता-आहिस्ता अपने गीले बालों को सुखाने लगी। तौलिए से बाल पोंछते हुए उसकी नज़र आईने में अपने ही अक्स पर पड़ी। बिना मेकअप का उतरा हुआ, मासूम चेहरा और आँखों में भरा बेइंतहा दर्द। मन्नत का दिल एक टीस के साथ भर आया। उसके ज़हन में एक ख़याल कौंधा ।
अगर सब कुछ नॉर्मल होता... अगर हालात ऐसे बिगड़े न होते, तो आज की ये रात उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और ख़ूबसूरत रात होती। आज उसकी **** होती। वो अपने होने वाले पति के सीने से लगकर प्यार और अपनेपन के सपने सजा रही होती, न कि इस तरह किसी अजनबी के कमरे में डर और घुटन के साए में घुट रही होती।
आँखों से एक गर्म आंसू की बूँद फिसलकर उसके गाल पर लुढ़क गई, जिसे उसने तुरंत तौलिए से पोंछ लिया, क्योंकि उसे अच्छी तरह पता था कि इस कमरे में उसके आंसुओं की कोई क़ीमत नहीं थी।
आईने के सामने खड़ी मन्नत बस खुद को देखती रह गई। दिमाग सुन्न सा था। जिंदगी चंद घंटों में किस मोड़ पर आ खड़ी हुई थी, वो समझ ही नहीं पा रही थी। कल तक जो सपने देखे थे, वो सब कांच की तरह बिखर चुके थे और अब इस अजनबी कमरे में वो एक ऐसे शख्स के साथ बंधी खड़ी थी, जिससे कभी दो लफ्ज़ सीधे मुंह बात तक नहीं हुई थी।
तभी बालकनी का कांच का दरवाजा सरकने की हल्की सी आवाज आई। प्रखर कमरे के अंदर दाखिल हुआ। उसके कदम पड़ते ही मन्नत के हाथ वहीं थम गए। उसने तौलिया जल्दी से साइड में रखा और सिमट कर खड़ी हो गई। कमरे की हवा में एक अजीब सा ऑकवर्ड सन्नाटा छा गया। दोनों एक ही छत के नीचे, एक ही कमरे में थे, लेकिन फासला मीलों लंबा लग रहा था। समझ ही नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से की जाए।
मन्नत ने हिचकिचाते हुए होंठ खोले, "वो... थैंक यू, आपने..."
ठीक उसी वक्त प्रखर भी कुछ बोलने के लिए आगे बढ़ा, "अगर तुम्हें..."
दोनों की आवाजें एक साथ टकराईं और दोनों ही झटके से चुप हो गए। मन्नत ने घबराकर नजरें नीचे कर लीं। प्रखर ने एक पल के लिए अपनी आंखें मूंदकर गहरी सांस ली। फिर जब प्रखर ने दोबारा बोलना चाहा, "सुनो..." तो मन्नत एकदम से बोल पड़ी, "जी, आप कुछ कह रहे थे?"
इस बार फिर दोनों के बीच एक बेतुकी सी खामोशी तन गई। अजीब सी कशमकश थी—एक की जुबान खुलती तो दूसरा खामोश हो जाता।
आखिरकार प्रखर ने खुद को संभाला। वो कुछ कदम आगे आया, अपनी गहरी और संजीदा आवाज में बहुत ठहर कर बोला, "देखो... हम दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि किन हालातों में यह शादी हुई है। न तुमने यह चाहा था, न मैंने। लेकिन अब जब तुम इस घर में आ ही चुकी हो, तो इतना यकीन रखो कि तुम्हें यहां कोई तकलीफ नहीं होगी। किसी चीज की कमी नहीं होगी और न ही कोई तुम्हारे साथ बत्तमीजी करेगा।"
प्रखर रुका। उसकी नजरें मन्नत के उतरे हुए, मासूम चेहरे पर टिकीं। उसने अपने शब्दों को थोड़ा और सख्त, लेकिन साफ लहजे में आगे बढ़ाया, "मगर... मैं तुम्हें इस बात का कोई भरोसा या दिलासा नहीं दे सकता कि हमारे बीच कभी पति-पत्नी जैसा कुछ हो पाएगा। उस रिश्ते की उम्मीद मुझसे मत रखना। मेरी जिंदगी में उन सब चीजों के लिए कोई जगह नहीं है।"
मन्नत ने पलकें उठाकर उसकी तरफ देखा। उन सर्द आंखों के पीछे छुपा एक गहरा, अनसुलझा दर्द मन्नत को साफ महसूस हुआ। उसने बहुत धीमी, कांपती हुई आवाज में कहा, "मैंने भी कभी ऐसी किसी उम्मीद के साथ यहां कदम नहीं रखा था। मैं बस... यह सब समझना चाहती हूं कि मेरी गलती क्या थी?"
"गलती हालात की थी।" प्रखर ने बेरुखी से कहा। "और कभी-कभी बेकसूर लोगों को भी उन हालात की कीमत चुकानी पड़ती है। बेहतर यही होगा कि हम दोनों एक-दूसरे की बाउंड्रीज समझें।"
दोनों के बीच इस रिश्ते की कड़वी हकीकत को लेकर यह अनकही बातचीत चल ही रही थी कि कमरे का आधा खुला दरवाजा अचानक पूरा खुल गया।
सामने रिद्धिमा खड़ी थी। रिद्धिमा के हाथ में शायद कोई फाइल या कुछ सामान था, पर उसके कदम वहीं चौखट पर जम गए। उसकी आंखें हैरानी और गुस्से से फैल गईं। उसने अपनी जिंदगी में एक वक्त के बाद प्रखर को कभी किसी गैर से, खासकर किसी लड़की से इस तरह ठहर कर बात करते नहीं देखा था। जो भाई किसी के सामने मुंह तक नहीं खोलता था, वो इस लड़की को समझा रहा था? उससे बात कर रहा था?
रिद्धिमा को यह देखकर बेहद अजीब और नागवार गुजरा। उसके चेहरे पर चिढ़ साफ तैर गई कि आखिर प्रखर इस लड़की को इतनी अहमियत दे ही क्यों रहा है।
रिद्धिमा सीधे कमरे के अंदर दाखिल हो गई। उसकी तीखी नज़रें पहले प्रखर पर और फिर मन्नत के सादे कपड़ों पर गईं।
उसने एक अजीब सा मुँह बनाया और तंज भरे अंदाज़ में बोली, "ख़ैर... अब शादी हो ही चुकी है, चाहे जैसे भी हुई हो। नीचे सब सो चुके हैं, पर इस घर की बड़ी बहन होने के नाते मुझे ही रीति-रिवाजों का ध्यान रखना पड़ेगा।"
प्रखर ने अपनी सर्द आँखें उस पर टिकाईं, पर कुछ बोला नहीं।
रिद्धिमा ने हाथ बांधते हुए आगे कहा, "प्रखर, हमारे यहाँ कंगन खोलने की रस्म होती है। बिना कंगन की रस्म पूरी किए तुम दोनों एक ही कमरे में नहीं रह सकते। कल सुबह पूजा और रस्म के बाद आ जाना अपने कमरे में... फ़िलहाल आज रात तुम गेस्ट रूम में शिफ़्ट हो जाओ।"
उस कमरे के भारी माहौल में दोनों के लिए यह एक तरह से राहत की बात थी कि उन्हें अलग-अलग सोने का मौका मिल रहा था। लेकिन रिद्धिमा का इस तरह ज़ोर देकर यह कहना कि 'कल से पास रहना'... दोनों के लिए बेहद ऑकवर्ड हो गया। एक अजीब सी असहज ख़ामोशी कमरे में तैर गई।
प्रखर ने कोई बहस नहीं की। उसने बस एक बार मन्नत की तरफ देखा, फिर रिद्धिमा की तरफ देखकर धीमे से "ठीक है" कहा और बिना कोई दूसरा लफ़्ज़ बोले कमरे से बाहर निकल गया।
प्रखर के बाहर जाते ही कमरे का तापमान और गिर गया। रिद्धिमा ने मन्नत को सिर से पैर तक एक हिकारत भरी नज़र से देखा। उसने मन्नत के सादे कॉटन सूट को घूरते हुए नाक-भौं सिकोड़ी, "आज शादी की पहली रात है। नई दुल्हन को आज की रात अपने जोड़े में ही रहना होता है... इतना भी नहीं पता तुम्हें?"
मन्नत ने अपनी उंगलियाँ भींचते हुए बहुत दबी आवाज़ में सफाई देने की कोशिश की, "वो... लहंगा बहुत भारी था। मैं सो नहीं पाती..."
"ओह, तो मैडम को अभी से कम्फ़र्ट चाहिए?" रिद्धिमा ने ज़हरीले अंदाज़ में उसकी बात काट दी, चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आ गई, "इस पूरे घर का कम्फ़र्ट, चैन और सुकून तो छीन ही चुकी हो... अब और क्या कम्फ़र्ट चाहिए तुम्हें?"
इतना कड़वा ताना मारकर रिद्धिमा एक झटके से मुड़ी और अपने घमंड के साथ कमरे से बाहर निकल गई।
उसके जाते ही मन्नत ने कांपते हाथों से आगे बढ़कर दरवाज़ा बंद किया और उसकी चौखट से अपनी पीठ टिका दी। उसने ज़ोर से अपनी आँखें मींच लीं। उसका दिल सीने में बेतहाशा धड़क रहा था, साँसें भारी हो चुकी थीं। बंद पलकों के पीछे आंसुओं की एक गर्म बूंद फिसल कर गाल पर आ गिरी। उस वीरान कमरे के सन्नाटे में उसे एक बात साफ़ समझ आ गई थी—इस आलीशान 'राठौड़ पैराडाइज़' में हर एक दिन काटना उसके लिए कांटों के बिस्तर पर चलने जैसा होने वाला था। यहाँ इज़्ज़त तो दूर, साँस लेने के बदले भी उसे हर पल ज़िल्लत सहनी पड़ेगी।